Tuesday, 27 March 2018

मोहब्बत लिख लेने दो....

कलमकार ने संगीतकार बनने की कोशिश कर रहा है बस अपने लिए, ,,, अच्छा ना तो ना सही तार तो छेड़ ही लेते हैं । click by LAKHA RAM

आप लिखते हो तो वाहवाही के साथ - साथ,  बहुत सारे सुझाव भी आते हैं । मुझे इन सब से बहुत प्यार है । ऐसे ही एक सुझाव पर मेरी प्रतिक्रिया, ,,,
 कुछ लोग कहते हैं 'जनाब कभी इश्क, मोहब्बत से भी उठकर लिखा किजिए ।'
  जरूर लिखेगें मगर अब तो मोहब्बत लिख लेने दो, जो कह रहा वक्त, उसकी तो सुन लेने दो ।
 जब चेहरे पर सख्त बाल होंगे । उनसे सफेदी झांकने लगेगी तब जरूर दर्शनशास्त्र झाड़ेगे ।
मगर अब तो लड़कपन के सपनों को संवारने दो , जो हैं हकीकत उससे दो - दो हाथ कर लेने दो ।
 जब लगेंगे कमाने, बढ़ेगी जरूरतें तब जोर - शोर से लिखेगें, महँगाई पर ।
 जब घर जाने की जल्दी होगी,  सड़कों पर ट्रेफिक सतायेगा । तब लिखेगें ना शहर की माली हालात पर लेकिन अब मस्त - मौला हैं । जल्दी का ना कोई सिलसिला हैं । शोर - शराबे में भी , मन किसी और धुन में रमा हैं तो क्यों ना इसे ही जीने दो ?
  आयेगा समय जब रेड लाईट होने से पहले निकले की कोशिश करेंगे मगर अब ट्रेफिक लाईट पर रूक अपनी बेपरवाह जिंदगी को लिख लेने दो ।
  रातों में उबासीयाँ आयेगी,  नींदे आँखों पे पहरा लगाएगी मगर फिक्र सोने नहीं देगी तब लिखेगें हर समस्या को ।
 अब महब्बूबा की यादों तले , नींदे हवा हैं,  रातों में भी जागने में मजा है तो महसूस कर लेने दो इस अद्भुत आनंद को ।
  जो वक्त हर किसी के जीवन से बस यूँ ही गुजर जाता है तो किसी एक को , भरपूर जी लेने दो ।
  तरस हमें भी आता हैं । भूखे - प्यासे बच्चों और बिलखती जनता पर । विश्वास दिलाता हूँ कि मेरी कलम उनकी हमसफ़र बनेगी,  उनकी समस्या के लिए तलवार बनेगी लेकिन बस चंद पलों के लिए कंघी बन हमसफ़र की जुल्फ़े संवारने दो । तन्हा गुजर रही जिनकी रातें,  उनके ख्वाबों को पर लगाने दो ।

 जो यह शिक्षा व्यवस्था की बिगड़ी हालत हैं । सुधारने की पुरजोर कोशिश करेंगे मगर अभी तो काॅलेज के सुनहरे मौके को भुनाने दो ।

 मोहब्बत का पड़ाव है इस पड़ाव में जी भरके ठहरने दो ।

  बहुत हैं जमाने में गिराने वाले,  एक हाथ है जो थामना चाहता हैं मुझे । बस उसे खोज लेने दो ।
 हाँ,  आईना धुँधला है । फिर भी एक चेहरा दिख रहा है उसे दिल भर के निहारने दो ।
    जब तक पतंग की डोर मात - पिता के हाथ में है तब तक हवा के विपरीत उड़ लेने दो । डोर कटने के बाद तो हवा के रूख के साथ उड़ना ही हैं ।
 
    मैं तो कहता हूँ कि आप भी....
     उम्र ढ़ल गई तो क्या ?   बालों से सफेदी झाँकने लगी तो क्या?   दौर गुजर गया तो क्या ?   फिर से दिल हरा करके तो देखो ।
     मुझे नहीं पता आपका मोहब्बत,  प्रेम से क्या अभिप्राय हैं ? मोहब्बत खुद से , खुद की जिंदगी से भी तो की जा सकती है,  जिससे थी कभी हमें , वापस उससे भी तो की जा सकती है ।
  प्रेम भौतिक सुख से परे आत्मीय सुख है जिसे बस महसूस किया जा सकता है, भोगा नहीं जा सकता ।


 जब हम समस्याओं के बारे में लिखेंगे तो उसमें बातें होगी हिंसा, अपराध और द्वेष की जो यूँ ही पढ़ने को बहुत मिल जाता है ।
 समस्याओं के समाधान के लिए किसी एक पक्ष में उतर जाना पड़ेगा। वह हमें मंजूर नहीं ।
 मोहब्बत हैं बेपक्ष ; इधर भी हैं, उधर भी हैं । इसके,  उसके ...हरेक के सीने में है । बस हालफिलहाल उसे लिख लेने दो।
कभी वक्त निकालकर सोचना कि सब प्रेम,  मोहब्बत से सरोबार हो जाये तो कितना मजा आए इस जमाने को जीने में ।
 जिसे जोड़ दिया बस तन की हवस से , उसे बिन हवस के महसूस किया जाए तो कितनी खुशी होगी जीने में ।
 शायद यही वो मोहब्बत हैं,  जो मैं आजकल महसूस करता हूँ,  जिस के लिए लिखता हूँ, , जिनमें ना गम , ना बिछड़न । बस मोहब्बत,  मोहब्बत और मोहब्बत ।
प्यार,  प्यार हर किसी का प्यार ; हर किसी से प्यार ।।

जिसका कोई अन्त नहीं, ,, बस सतत्,  निरन्तर । बिना रुके ,,,,जो ख्वाब नहीं,  ख्याल नहीं , हकीकत है । हर किसी को दिखती नहीं,  हमें सच को देखने की आदत जो नहीं हैं ।

 खुद की हकीकत , खुद में ही हैं ।

दिल में झांक कर देखों,  तुम्हारी हकीकत भी प्यार ही है ।
हर किसी की हकीकत है बस प्यार,  मोहब्बत,  प्रेम या ऐसा ही कुछ ।  नहीं,  नहीं यही, ,, प्रेम, आलौकिक प्रेम,  निश्छल प्रेम ।
बस हर किसी से प्रेम । हर चीज से प्रेम । हकीकत से प्रेम ।।
बस प्रेम,  प्रेम और प्रेम, ,,,और कुछ भी नहीं .....

                    * छगन चहेता

Sunday, 18 March 2018

कहानी : typing... (टाईपिंग...)

कहानी प्यार, मोहब्बत की नहीं हैं मगर शायद कुछ वैसी ही हैं ।
 वो मेरे स्कूल में साथ पढ़ती थी मगर अलग - अलग वर्ग थे । पता नहीं दोस्ती कहा हुईं शायद स्कूली बस में,  दोनों साथ जो आते थे  ।
दोस्ती बस मुस्कुराहट से शुरू होती और मुस्कुराहट पर खत्म । बीच में चंद पलों के फासले के सिवाय कुछ ना । हाँ,  कभी -  कभार चाॅकलेट , बिस्किट ले - दे दिया करते थे ।
  फिर लगभग दो सालों के बाद इत्तेफाक से  वो भी जिस कोचिंग संस्थान में ; मैं जाता था उसी में एडमिशन लेती है मतलब फिर से सहपाठी हो जाते हैं । इतने समय बाद मिलने पर भी सिर्फ वही पहले वाली मुस्कुराहट,  बस मुस्कुराहट ।
 " अरे!  तुम यहाँ । हाँ,  तुम भी?  जी , मैं भी ।
  कक्षा में सबसे पीछे बैठने वाली लड़की । अब आगे वाली बैंच पर बैठती हैं । मेरे वाली बैंच पर , स्कूल का जिक्र करके कारण पूछा तो बताया कि पीछे से दिखता नहीं हैं बोर्ड पर । पर उस दिन जब मैं पहली कालांश में नहीं गया था । लेट गया था  तब वो सबसे पीछे बैठी थी । आगे वाली बैंच भी खाली थी...... ।
"वैसे मुझे हमेशा से ही आगे बैठने का शौक है । बस यूँ ही । बाकी कक्षा में बैठने के स्थान से शिक्षा ग्रहण करने की क्षमता का , हमें ज्ञान ना हैं । "
ना जाने क्यों?  जब हम क्लास से छुटते तो वो पीछे से आवाज लगाती और कहती - "रुक , कुछ काम था।"
" हाँ,  बोल।"
फिर लम्बी सी चुप्पी ।
मानो कुछ कहना चाह रही हो पर कह नही पा रही है।
फिर हड़बड़ी से ; "हाँ,  वो कल आते वक्त केमिस्ट्री की बुक लेते आना ।"
 ऐसा कई दफ़ा हुआ और हर बार नये बहाने से बात टाल देती ।
वहाँ हम एक साल साथ पढ़ें ।
 यूँ ही,  एक साल और साथ में बिता,  मुस्कुराहट और मुस्कुराहट से, ,, कुछ दबी - दबी ख्वाहिशों में ...।

 फिर दो साल बाद सुबह - सुबह किसी नये नम्बरों से फोन आता है ।
सामने से " हैलो ! " युवकती की आवाज थी।
हैलो!  हाँ,  जी ..... हैलो , हैलो!
सामने से कोई प्रत्युत्तर नहीं,  सोचा तकनीकी खराबी होगी ।
मैंने काॅल बैक किया लेकिन कोई उत्तर नहीं, ,,। मेरे जेहन में आया कि हो न हो ये वही है ।
शायद वो मुस्करा रही होगी और मुस्कुराहट आवाज नहीं करती।
 जवाब में,  मैंने भी मुस्करा कर फोन रख दिया ।
तभी वाट्सएप पर उसी नम्बरों से मैसेज आता हैं, ,, स्माईली(☺) । मैंने भी जवाब में स्माईली(☺) भेजी ।
 दोपहर में फेसबुक देखी तो उनकी फ्रेंड रिक्वेस्ट आयी हुईं थी, ,,, मैंने स्वीकार कर ली ।
  कुछेक महीनों बाद उनकी फेजबुक आईडी पर इन्गेजमेंट
अपडेट थी । मैंने टिप्पणी में " बधाई हो " लिखा ।
उनकी टिप्पणी पर प्रतिक्रिया के रूप में 😃(हा हा ) था ।
 उस दिन न जाने क्यों?  मुझे अजीब सा महसूस होने लगा । हमारे स्कूल,  ट्यूशन वाले दिन याद आने लगे, ,, उनका यकायक आगे बैठना , उनका मुझे ट्यूशन से छूटते वक्त रोकना ,,, उनकी मुस्कुराहट, ,, फोन पर उनका अन्दाजा लगाना,,,, फिर मुस्कराना, ,,मानो सब कुछ ......जो उससे व मुझसे जुड़ा था।

मैं शायद उसे समझने लगा था मगर अब ......?

कल रात,  मैं जब वाट्सएप देख रहा था तो उनके नाम के नीचे typing... लिखा आ रहा था लेकिन बहुत देर तक कोई मैसेज ना आया ।
Suman is typing...

  शायद वो कुछ कहना चाह रही हैं मगर कह नही पा रही है । नहीं,  नहीं अब वो कहना जरूरी नहीं मानती होगी । फिर भी सोच रही होगी, ,, कहूँ या नहीं, ,,, कहूँ तो क्या?  इसी उहापोह में , वो मोबाइल का कीबोर्ड निकाल कुछ लिखती होगी या कुछ लिखना चाहती होगी या लिख कर कुछ मिटाती होगी ।
पर मुझ तक कुछ ना पहुँचाना चाह रही होगी या पहुँचा नहीं पा रही होगी ।
 ना जाने क्यों?  अब मैं भी कीबोर्ड निकाल कर उसे कुछ लिखना चाहता हूँ लेकिन कुछ लिख नहीं पा रहा हूँ या कहूँ लिखना जरूरी नहीं मान रहा हूँ ।।
वो भी मेरे नाम के नीचे typing... लिखा देख मैसेज का इन्तजार करती होगी , शायद ..।
 chhagan is typing...
     
                                       * छगन चहेता
 
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Saturday, 10 March 2018

दहलीज़

मैंने इस ब्लाग का नाम " दहलीज़ " रखा है ......

दहलीज़ अर्थात सीमा, ,,।  हमारे मारवाड़ में घर के आंगन के छोर पर 4-5 इंच ऊँची दीवार होती है उसे घर की "दहलीज़" कहते हैं ।  मारवाड़ी में  "पेटली" कहते हैं ।

आजकल हमारे शहरों में "दहलीज़" कहाँ होती है बस "चौखट" होती है ।

दहलीज़ का मतलब हद भी होता है।

 लेकिन यहाँ मेरा अभिप्राय सीमा से हैं । मेरी मानसिक प्रवृत्ति के अनुसार में पक्ष,  विपक्ष ;  भूत, भविष्य की ; अच्छे , बुरे की दहलीज़ पर हूँ यानी पूरी तरह से कोई सच,सच नहीं होता ना ही कोई झूठ , पूरी तरह से झूठ होता हैं ।

किसी के पक्ष में हूँ मतलब यह नहीं कि विपक्ष को नकार ले। कोई बुरा है तो उसका भी कारण होगा उसे भी सुनना जरुरी हैं। भविष्य की दौड़ में भूत को  भूल नहीं सकते ।

थोड़ा अपनों का , थोड़ा गैरों का भी..।

मेरी उम्र के पड़ावनुसार,  मैं मोहब्बत की दहलीज़ पर हूँ।

 समुंद्र में उतरना भी चाहता हूँ मगर उतर नहीं सकता तो उसकी दहलीज़  पर बैठे-बैठे इसकी दरिया में डूबते , तैरते आशिकों को देख रहा हूँ।

समाज की दहलीज़ पर बैठे-बैठे अपने,पराए; झूठे, सच्चे लोगों को महसूस कर रहा हूँ।

 इस दौर में मुझे यहीअच्छा लगता है ।

हाँ,  अगर आपने मुझे सही तरह से नहीं समझा है तो मैं आपको दहलीज़ पर न दिखकर किसी एक तरफ ही नजर आऊँगा ।

वैसे तो मैं इस दहलीज से उतना नहीं चाहता क्योंकि यह दहलीज़,  मेरे गांव वाले घर के आंगन की दहलीज जितनी नहीं है।  जिसे पार किया जा सके या  वापस चढ़ा जा सके।
 यह एक तरह से मेरे गांव के घर की दहलीज़ जैसी भी है जिसमें एक बार जाने पर वहीं के होकर रह  जाते है।

 दुनिया में देख रहा हूँ कि बड़े कद के लोग, इस दहलीज़ को आसानी से पार कर रहे हैं।  इधर से उधर जा रहें हैं । मुझे डर हैं, कहीं यह इधर से उधर जाने के चक्कर में मुझे ठोकर देकर गिरा न दे । मेरा कद  दुनिया में इतना ऊँचा नहीं कि इस दहलीज़ को पार कर सकूँ या वापस चढ़ जाऊँ ।

यह इत्तेफाक ही होगा कि वह मुझे किस तरफ गिराते  है ।  जिस भी तरफ गिरूंगा,  उस दिन से दुनिया के लिए तो एक जाना - पहचाना किरदारा  बन जाऊंगा मगर खुद के , इंसानियत (इंसान के रूप में)  और साहित्य के लिए(साहित्यकार के रूप में ) कहीं खो जाऊंगा । कहीं अनन्त में चला जाऊंगा । तब शायद तुम मुझे बहुत प्यार से बुलाओगे।  तुम दहलीज़  पर चढ़कर ,  अपना हाथ देकर ;  मुझे वापस खींचने की कोशिश करोगे  तब शायद,  मैं भी ना आना चाहूँ ।

             * छगन चहेता
[ मजेे की बात यह हैं कि मेरे प्रिय गाना भी  "दहलीज़ पर मेरे दिल की ,,,,,,, " ( जीना जी) है ]

Thursday, 1 March 2018

लोचा आरक्षण का ...

सर्वप्रथम, मैं हमारे देश की वैचारिक प्रवृत्ति को देखते हुए स्पष्ट करना चाहता हूँ कि मैं अपने देश के संविधान सहित तमाम संविधान निर्माताओं का पूरे दिल से सम्मान व आदर करता हूँ ।
  शुरुआत एक उदाहरण से करते है । दो विद्यार्थी हैं ।एक आरक्षित वर्ग से है तथा दूसरा सामान्य वर्ग से । आरक्षित वर्ग वाला लड़का शहर की अच्छी काॅलोनी में रहता है अर्थात छुआछूत,  दलित मानकर प्रताड़ित करना जैसा कुछ नहीं मतलब किसी भी प्रकार से  पिछड़ा हुआ नहीं माना जा सकता।
   दोनों में से सामान्य वर्ग वाले लड़के के बाहरवीं कक्षा  का परिणाम आरक्षित वर्ग वाले लड़के से 20 प्रतिशत अधिक रहता है। दोनों शहर के एकमात्र Govt. कॉलेज में एडमिशन लेने के लिए apply करते हैं। आरक्षण की वजह से एक का सेलेक्शन हो जाता है लेकिन दूसरे का नहीं होता है तो बताइए उस बच्चे पर क्या बीतेगी  आप कुछ भी कहो, सविधान  समानता का अधिकार देता है मगर सच में है नहीं । हां देश में ऐसा वैसा कुछ भी होता हो मगर जो उस बच्चे के भविष्य के साथ हुआ उसका जवाब कौन देगा?
 मैं आरक्षण को सपोर्ट वालों से पूछना भी नहीं चाहता । क्यों पूछना?  वह संविधान के प्रवक्ता नहीं है?  मेरा सवाल उस संविधान से हैं जिसने वादा किया था कि वह हर नागरिक को  राजतंत्र से , अच्छा एक तंत्र देगा । मेरा सवाल उस संविधान से हैं । संविधान जब तक , हर एक अधिकार को बिना किसी किंतु परंतु के नहीं देगा तब तक वह आदर्श नहीं कहलाएगा।
 हमारे संविधान दोहरी नीति हटनी चाहिए ।
जवाब ।जवाब ।जवाब।
किसी के साथ अन्याय करके किसी को न्याय देना कहाँ तक सही हैं ।
अब उसेे कॉलेज में प्रवेश नहीं मिला तो सीधी सी बात है उसके सामने रोजगार की समस्या पैदा होगी । अब उसके पास मानसिक शक्ति है तो वह शारीरिक शक्ति का प्रयोग करके रोजगार करने में शायद ही रुचि  ले ।जाहिर सी बात है। उसके मन में नफरत फैलेगी सिस्टम के प्रति , तो वह अपराध की और बढेगा जिसकी पुष्टि अपराध जगत में बढ़ते पढ़े लिखे "लोगों की संख्या" की रिपोर्ट हैं ।
मुझे बचपन से सुनने को मिला है कि IAS लेवल के A ग्रेड के अधिकारी बहुत इंटेलिजेंट होते हैं मगर यह बात समझ नहीं आती फिर क्यों अपराधी पकड़ में नहीं आते ?
अब समझ में आया कि आरक्षण की वजह से जो भाई साहब 55% के साथ पुलिस अधिकारी बन गया और सामान्य वर्ग का  80% वाला बंदा निक्कमा बैठा।  जब वह अपराध जगत में जाएगा तो...?
"पेट की आग इंसानियत , धर्म कुछ नहीं देखती"
 तो  जब 80 प्रतिशत वाला बंदा अपराध करेगा तो वह 55% वाला कुछ ना कर सकेगा। उनके मानसिक क्षमता में इतना ज्यादा अन्तर है ।
 यही कारण अपराध बढ़ रहे हैं अपराधी पकड़ से बाहर हैं।
 यह सच है सच है,,,।
आप अन्यथा में ना ले। मैं यह नहीं कह रहा कि दलित मानसिक रुप से कमजोर होते हैं तथा सामान्य वर्ग वाले मजबूत होते हैं। सामान्य वर्ग के जो लोग इस पद के लायक नहीं है। वह तो वैसे ही बाहर हो जाते हैं मगर आरक्षित वर्ग वाले संख्या में कम होने के कारण,  असक्षम लोग भी आ जाते हैं।

"मानसिक शक्ति जाति धर्म देखकर नहीं आती है"

मुझे नहीं लगता कि मौजूदा आरक्षण व्यवस्था से दलितों का उत्थान  होगा बल्कि इससे देश के हुनर , प्रतिभा का पतन होगा या पलायन होगा ।

{इसी विषय पर 1970 में टिप्पणी करते हुए पूर्व वाणिज्य सचिव और अमेरिका में राजदूत आबिद हुसैन ने कहा था प्रतिभा के नष्ट होने से बेहतर है कि वह पलायन कर जाए। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आरक्षण व्यवस्था का उद्देश्य जाति पर जोर देना नहीं, जाति को खत्म करना था।}

"सक्षम लोगों की बेरोजगारी मुझे बहुत टीस देती हैं "

मेरी मानो तो आरक्षण को फिर से , एक सिरे से शुरु किया जाए। जाति आधारित नहीं,  आर्थिक आरक्षण दिया जाए। गरीबों को पढ़ने के लिए आर्थिक सहायता दी जाए ना कि उन्हें शैक्षणिक योग्यता में रियायत दी जाए ।
दलितों को मानसिक रुप से मजबूत किया जाए ताकि  उनको तथाकथित उच्च जाति वाले लोग दबा न सके । उन्हें शिक्षित करके,  उनको अधिकारों से वाकिफ कराया जाए।
हमारी संविधान में दोहरी नीतियाँ हैं ,,,, एक ओर हम जातीय व्यवस्था को खत्म करना चाहते हैं वहीं दूसरी ओर  आरक्षण को जातिगत रुप से दे रखा गया है।
 जिसके कारण सरकार आपको बाकायदा लिख कर देती है कि आप उस जाति , उस उपजाति से है ।
आप पिछड़े या दलित हो।  रंगीन पेपर लिख कर देती है भाई साहब।।
ऐसे व्यवस्था के साथ हम कभी जातिय भेदभाव को खत्म नहीं कर पायेगें । फिर भी ना जाने कैसे ? हमारे नीति - निर्माता इस विरोधाभास को साथ लेकर नामुमकिन स्वप्न देख रहे हैं ।

पता नहीं कब?  संविधान का दिया समानता का अधिकार लागू होगा,  सच्चे मायनों में ।।

देश में अशांति का कहीं न कहीं कारण आरक्षण भी हैं । जब लोगों की मेहनत को आरक्षण के नाम पर अनदेखी की जाती हैं तो उनका गुस्सा होना लाजमी हैं ।
 हम गुजरात को पटेल आरक्षण माँग में दहकता दहकता चुके हैं और गुर्जर आंदोलन से भी वाकिफ हैं ।
ऐसे देश में समय समय पर ना जाने कितने ही आन्दोलन होते रहे हैं, ,,।
    जो लोग मानते हैं कि आरक्षण दलितों का हक है तथा आरक्षण से प्रतिभा का पतन नहीं होता, , वैसे उनके पास कोई तर्क नहीं हैं,  कुतर्को के अलावा ।
अगर तर्क है तो बताओ ???
समृद्ध होकर भी पटेलों ने आरक्षण की माँग क्यों की ?
 आप मानते हो कि आरक्षण से असक्षम लोग तंत्र में नहीं आते । ठीक है मान लेता हूँ । लेकिन पहले आपको मेरे प्रश्न का उत्तर दीजिए ।
यहाँ मैं यह सिद्ध करना चाहता हूँ कि वास्तव में आरक्षण से असक्षम लोग तंत्र में आ जाते हैं ।
प्रश्न : सैन्य सेवाओं में आरक्षण क्यों नहीं हैं ?
आपको याद हो तो एक बार माँग होने पर आरक्षण के आधार पर भर्ती भी हुईं थी बाकी बाद का सबको पता ही है, ,,,,,
खैर अब उत्तर पर आते हैं । उत्तर - आरक्षण कमेटी को पता था कि आरक्षण की वजह से असक्षम लोग सैन्य तंत्र में आ जाएंगे और वह इस नव आजाद देश की सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं करना चाहते थे इसीलिए यह एक क्षेत्र मजबूत भी हैं ।

मैं जब आरक्षण को हटाने की बात करता हूँ तो कई लोग मुझे तर्क देते हैं या कहो कि कुतर्क देते हैं ।
 मगर इसका उत्तर हैं, ,,,
 मैं जब शिक्षा नगरी कोटा गया था तब मुझे ऐसे भी लोग मिले जो IIT की तैयारी करने आये तो थे मगर बिल्कुल लापरवाह थे , पढ़ाई के प्रति । जब मैंने ऐसे दोस्तों से बात करके कारण जानना चाहा तो चौंकाने वाला था ।
  उन्होंने सीधा मगर बड़ी अदबता से उत्तर दिया -- भाई हम आरक्षण के दम पर सलेक्ट हो जायेगें ।
मैंने कहा फिर भी पढ़ लेने में क्या हर्ज हैं । देश को पढ़ें - लिखे इन्जिनियर मिलेंगे ।
वो कहते हैं भाई सच बताये,  हमें IIT जाने का कोई शौक नहीं हैं बस घर वाले चाहते है । आरक्षण हैं तो उन्हें ये भी डर नहीं कि सीट नहीं मिलेगी ।
 अब क्या करेगा चाँद?  क्या करेगी चाँदनी?
यह किसी एक का किस्सा नहीं हैं । यह हकीकत है देश की।
 इसका उत्तर चाहिए , मुझे ,,,
मगर आरक्षण प्रेमियों से उतर नहीं ।
 मुझे मेरे देश के सविधान से उत्तर चाहिए जिन्होंने वादा किया था कि राजतंत्र से बेहतर तंत्र हर  नागरिक को दूँगा।
 जवाब।।। जवाब।।।  जवाब

 अरे ! हाँ , कुछ लोग डॉक्टर की भाषा में समझाते हैं देख भाई पिछड़ापन , पोलियो के समान बीमारी है एवं आरक्षण ही इस बीमारी का टीका है । जैसे पोलियो का वायरस खत्म होने पर टीका बन्द कर दिया गया। ( फिर से शुरू कर दिया वापस ) वैसे ही दलितों का स्तर बढ़ने पर आरक्षण भी खुद-ब-खुद बंद कर देंगे।

 मगर कब ?

अब मेरा तर्क सुनो तो यह जो आरक्षण नामक टीका है ना इसके एंटीबायोटिक की तरह दुष्प्रभाव भी बहुत है । जब पिछड़ापन बीमारी  बहुत ही घातक स्तर पर  थी तब इसका इलाज यही "आरक्षण" जायज था मगर अब यह बीमारी अंश मात्र रह गई है तो यह दुष्प्रभावी दवाई  (आरक्षण) को बंद कर, किसी आयुर्वेदिक इलाज को शुरू किया जाना चाहिए ।

मैं भी अच्छी तरह जानता हूँ कि प्राचीन समय में दलितों का शोषण बहुत हुआ । कहीं - कहीं अभी भी हो रहा है और दलितों का आरक्षण भी नाजायज उम्मीदवार ले जा रहे हैं ।

मगर किसी को दयनीय मत बनाओ ।
पिछड़े वर्ग को मेहनत के बल पर आगे लाओ
खड़ा होना सिखाओ ,  लाठी सहारे कब तक खड़े रहेंगे,  पैरों पर खड़ा होना सिखाओ ।

काफी लोग जानते हैं कि आरक्षण व्यवस्था में अब बदलाव की जरूरत है मगर वो यह भी जानते हैं कि इस मुद्दे के दम पर राजनीति करके,  वो जनता का वोट नामक आशीर्वाद आसानी से प्राप्त कर सकते हैं ।
आपणे मारवाड़ मो कहावत है न कि " पाड़े,  पड़ी ऊँ की कोम,  थनो दूध ऊँ मतलब है ।"

 एक बार फिर साफ करना चाहता हूँ कि मैंने ना दलितों को कमजोर बताने की कोशिश की है । ना ही यह लेख दलित विरोधी है बल्कि मैं वास्तव में उनका उत्थान कैसे हो सकता है ? यह बताना चाहता हूँ ।
अधिक सफाई देना नहीं चाहता । यह आपकी मानसिकता है कि आप इसे किस रुप में लेते हैं।
 
      " बाकी राम राखे"

《सामाजिक सुधार की इस  रणनीति का दूसरा भाग कमपेनसेटरी डिस्क्रिमिनेशन (प्रति पूरक भेदभाव / क्षतिपूर्ति भेदभाव या सकारात्मक कार्यवाही) से संबंधित है जो निम्न लिखित प्रायोजन लागू करता है:



1. सार्वजनिक सेवा की नियुक्ति और प्रमोशन मे आरक्षण लागू करके,

2. विधायिका की सीटों मे आरक्षण लागू करके (केंद्रीय, राज्य, पंचायत राज, मुनिसिपल बॉडीस आदि),

3. शैक्षिक और प्रोफेशनल कॉलेजस की सीट मे आरक्षण लागू करके,

4. निर्धारित योग्यता मापदंडो मे छूट प्रदान करके,
<मुझे सबसे समस्या बिंदु संख्या 1,3 व 4 से हैं >
सम्पूर्ण दलित हितैषी नियमों से नहीं, ,,
 पाठकों के नाम संदेश-
                               यदि आपके पास आरक्षण के पक्ष में तर्क है तो  हमें कमेंट बॉक्स में जरुर बताए ताकि ,,,,,,।।

प्रतिक्रिया का इन्तजार ........
* छगन चहे

Tuesday, 20 February 2018

अरुणाचल में न्याय हुआ या अन्याय, ,,,?

न्यूज़ अरुणाचल प्रदेश- अरुणाचल के तेजू में 5 वर्षीय
बच्ची का शव 17 फरवरी को मिला था । जिसका सिर,  धड़ से अलग था। जाँच में बच्ची के साथ दुषकर्म होना पाया गया। पकड़े गये संदिग्ध दो आरोपियों को उग्र भीड़ ने थाने से छुड़ा कर , पीट-पीटकर मार डाला ।

शायद यह खबर आपने भी पढ़ी होगी, ,,, उसके संदर्भ में


मुझे नहीं मालूम कि उन आरोपियों के साथ सही हुआ या गलत मगर उस मासूम बच्ची के साथ बहुत ही बुरा हुआ ।
  आरोपियों के साथ जो भी हुआ उसके जिम्मेदार हमारी न्यायप्रणाली व व्यवस्था तंत्र हैं ।
 बच्ची के साथ जो बुरा हुआ उसकी जिम्मेदार हमारी शिक्षा प्रणाली व आरोपियों के बेपरवाह परिजन हैं जिन्होंने मानव को शैतान बनने से रोका नहीं । अगर हमारी न्याय प्रणाली कठोर व तेज होती तो लोगों का धैर्य जवाब ना देता । भीड़ को मालूम था कि इन आरोपियों का भी वहीं होगा जो हर अपराधी का होता हैं तारीख पर तारीख और ......?
न्याय जब तक अपराधियों के लिए डरावना ना हो तब  तक अपराध पर अंकुश लगना नामुमकिन सा है ।
आप , हम कुछ लोग शांति चाहते है लेकिन हमारे शांत रहने से शांति नहीं होगी ना,,,,,
मैं नहीं कहूँगा कि आरोपियों के साथ बुरा हुआ क्योंकि जो बच्ची के साथ हुआ है , वह इंसानियत के लिए भयानक हैं ।
मेरे लिए मानवता / इंसानियत ; मेरे देश, देश के संविधान से कहीं ऊपर है ।  मैं मेरे देश , संविधान के खिलाफ हो सकता हूँ मगर कभी मानवता के खिलाफ खड़ा नहीं रहूंगा ।
 मुझे मेरे देश व संविधान पर पूर्ण विश्वास है कि मेरा देश अपनी ऐतिहासिक पहचान के अनुरूप  सदा मानवता के पक्ष में ही होगा ताकि मैं भी मेरे देश के पक्ष में खड़ा रहूँ  ।
अगर हमारी न्याय प्रणाली व व्यवस्था तंत्र सही व तीव्र होता तो आरोपियों का जो भी होता कानून के मुताबिक होता ।
कानून का टूटना देश के लिए बुरी खबर है मगर कानून ही संदेह के घेरे में हो तो.....?
 मेट्रो ट्रेन, स्मार्ट सिटीज से पहले यह आवश्यक है कि हमारे देश की शिक्षा प्रणाली सुधरे, जहाँ संस्कार सिखाया जाए । देश में महंगाई नियंत्रित हो ताकि माता-पिता कुछ वक़्त अपने बच्चों के साथ भी बिताए जिससे बच्चों को कुछ अच्छे  संस्कार दे पाएंगे ।
मेरी आशा है कि ना बच्ची के साथ हुआ, वह कभी दोहराया जाए , ना ही आरोपियों के साथ हुआ,  वह दोहराया जाए ।
आज इंसानियत मर रही है , देश का कानून टूट रहा है , न्याय न्यायालयों के बजाए सड़कों पर भीड़ कर रही है और हम शांति के लिए शांति से बैठे हैं ।
हम एक इंसान के रूप में सोचे तो आरोपियों के साथ सही हुआ मगर देश के कानून के साथ सही नहीं हुआ अगर देश की व्यवस्था तंत्र को नहीं सुधारा गया तो हमारे देश का भविष्य अंधकारमय  होगा ।
न्याय सड़कों पर होता दिखेगा । वह भी लाठी के दम पर।
 दोष सिस्टम का है। उस सिस्टम का जिसके हम भी एक हिस्सा है यानी दोषी हम भी हैं।
जब भीड़ ने  अपने देश के बारे में , संविधान के बारे में, शिक्षा प्रणाली के बारे में,व्यवस्था तंत्र के बारे में .....सोचा होगा तो उन्हें अच्छा न तो न सही मगर सही "यह ही" लगा होगा और पीड़ितों को तब तक सही लगेगा जब तक न्याय व्यवस्था सही ना होगा ।
ठीक उसी प्रकार जैसे हमें अग्रेजों की जान लेने वाले भगतसिंह का काम  सही लगता हैं एवं उन्हें अपना आदर्श मानते हैं अगर वो सही थे तो वो भीड़ गलत क्यों?
                                 * छगन चहेता
आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा ......

Friday, 16 February 2018

वाकई खुशी कहीं खो गई है ? - छगन चहेता

नहीं , बस हमारा नजरिया बदल गया है और हम खुशी के लम्हों को नजरअंदाज करने लग गए हैं ।
नहीं तो देखो खुशी के कितने पल आते हैं , हमारी जिंदगी में -
☺ tv चैनल खोलते ही पसंद के सीरियल या फिल्म का आना।
☺ बाजार में घूमते कहीं बचपन के दोस्त का अचानक मिलना।
☺ बहुत देर तक लाइट नहीं है और मैच शुरु होते ही  लाइट का आना।
☺ छुट्टी वाले दिन देर से उठना ।
☺घर की सफाई में, खोई किसी प्यारी चीज का मिलना।
☺ बस स्टॉप जाते ही बस का आ जाना ।
☺संवरने के बाद दर्पण में देख कर मुस्कराना ।
☺कड़ी धूप में किसी का लिफ्ट देना।
 इन खुशियों के लम्हों की लिस्ट लंबी है ।
क्या आपकी जिंदगी में ऐसे पल नहीं आते ? आते हैं ना । फिर भी आप खुश नहीं होते क्यों , पता है? आप हमेशा बड़ी-बड़ी , बहुत बड़ी-बड़ी खुशियों की तलाश में रहते हो। जैसे बड़ा सा घर , बडी सी गाड़ी,  मोटी सी सैलरी  आदि । ये सारी खुशियाँ बड़ी मुश्किल से मिलती है और इन्हें हासिल करते-करते हमारे चेहरे पर इतनी सरवटे पड़ जाती हैं कि यह सब मिलने पर भी हमारे चेहरे की मुस्कुराहट , सलवटो में से दिखाई भी नहीं देती । किसी दार्शनिक  ने कहा था कि "छोटी-छोटी खुशियों का लुफ्त उठाइए क्योंकि जिंदगी में आगे बढ़ने पर  कभी पीछे मुड़कर देखोगे तो तुम्हें इन नन्ही - नन्ही  खुशियों का ढेर दिखाई देगा।"
 हमारे जीवन में दुख आते है, किसी को खोने पर, किसी से बिछड़ने पर । जाहिर सी बात है , दुख होगा क्योंकि हम भावनात्मक प्राणी हैं.... पर इतना भी दुख को दिलो-दिमाग पर मत चढ़ने दें कि होठों से मुस्कान ही गायब हो जाए ,  दिल के अरमान , ख्वाब सब खत्म हो जाए । कहते हैं ना कि "समय हर दर्द की दवा है।"
 राम ; सीता से बिछड़ कर भी रहे थे ना , राधा ; कृष्ण से बिछड़ कर भी जीते थे ना ।   जब हर संभव कोशिश नाकाम हो तो उसे भूलना ही बेहतर है इसी में खुशी है ।  जब सामने वाला भी आँखें चुराए तो दिल को यह समझना ही चाहिए कि यह नहीं तो और सही और नहीं तो कोई और सही ।
यह छोटी-छोटी बातें ही एक दिन खुशी का द्वार खोलेगी । किसी एक से नजर हटा कर  तो देखो दुनिया कितनी खूबसूरत हैं , कितनी प्यारी है ।
बस अकेले में हँस कर  तो देखो,
 भीड़ में मुस्कुरा कर तो देखो,
 बचपन का बचपना दोहरा कर तो देखो,
 मैं सच कहता हूँ,  यही फंडा है जीने का ।
 क्या है ना कि हम  कुएँ के मेढ़क है जो कुएँ को ही दुनिया समझते हैं , कभी बाहर निकल कर तो देखो समुंद्र भी तो है,,,,,, आ जाईये, ,,।
 चलो अब समुंदर में आ गए हैं तो क्यों ना , आज के पहले की सारी बुरी यादें , जो भगवान(वो यहाँ भगवान को दोष इसलिए दिया कि मनुष्य को दोष देकर हम किसी को नाराज नहीं करना चाहते) ने हमें तकलीफे,  दुख दिए हैं, उनको भूलकर बस खुशी के पल , थोड़े ही सही ; समेटकर अब से खुशियों का सफर शुरू करें । जिसमें हमसफर भले बदले परंतु हमेशा मुस्कुराहट  साथ हो , क्योंकि मैंने कहीं धर्म ग्रंथ में पढ़ा था कि मनुष्य जीवन का उद्देश्य संपूर्ण सुखों की प्राप्ति करना ही हैं ।

                             *छगन चहेता


Saturday, 20 January 2018

मासिक धर्म,,,,पर छगन चहेता कि अपनी बेहतरीन कृति, ,,

मेरी अब तक की सर्वश्रेष्ठ कृति, ,,,,,नारी के रज्जोधर्म / माहवारी / मासिक धर्म पर।।।।।
   
           रज्जोधर्म / महावारी / रज्जोधर्म 
          (कविता )
                                                ~छगन चहेता 
हमने ज्ञान विज्ञान की खोजों से ,
हर एक अंधविश्वास से पर्दा उठा दिया ।
 फिर भी क्यों क्यों ?
क्यों नहीं ,
 नारी की माहवारी से नापाक का धब्बा मिट पाया?
 क्यों संतान उत्पन्न करने  वाले ,
नारी के रज्ज को ही अपवित्र बोल दिया ।
महावारी के चक्र में ,
 महिला को भगवान के दर पर जाने से रोक दिया ।
 क्यों क्यों क्यों ?
 क्यों, जिस अंग विशेष के तत्वों से ,
 हमारे अस्तित्व का निर्माण हुआ ।
उस तत्व को हमने नापाक करार दिया ।
 नीति धर्म की बातों को ,
 हमने भी पढ़ा ,
 गीता कुरान से ,
 धर्म ग्रंथों से ; हम भी वाकिफ है ।
 पर शायद कहीं नहीं था ।
माहवारी पर अपवित्रता का ठप्पा ।
 फिर क्यों क्यों ?
चंद तुच्छ लोगों की तुच्छ सोच को ,
 हम दुनिया वालों ने मान लिया ।
 क्यों क्यों क्यों? 
क्यों नहीं , समझदार कहलाने वाले ,
 महापुरुषों ने ,
 इस मिथ्या को मिटा दिया ?
 महापुरुषों की बातें छोड़ो ,
 क्यों क्यों क्यों ?
 वुमन पावर का टैग रखने वाली ,
 नारी ने भी अब तक है; मौन धरा ?
 क्यों क्यों क्यों ?
 हो रही शर्म ,
 रजोधर्म की बात बताने में ,
 तुम इसी रज्ज विशेष के कारण
 मां बन पाओगी 
ग़र है शर्म
 तुम्हें रजोधर्म से
 तो खुद को पुरुष  कहलाने की
 आदत डाल दो ।
क्यों क्यों शर्म है?
 तुम्हारा वही रज्ज विशेष ही तो है,
 तुम्हारा विशेषाधिकार
 बिन रजोधर्म
 तुम भी हो पुरुष सम्मान ।

जो रक्त, 
 हर मानव के अंग अंग में बहता है 
अगर नारी के अंग विशेष से बह गया 
तो क्यों क्यों क्यों? 
पाक जगह पर नारी की उपस्थिति को ,
निषेध करार दिया ।
अगर मेरी हर दलील तुम्हें झूठी लगती है ।
अभी भी तुम्हें ,
 नारी की माहवारी ; अपवित्र लगती है ।
 तो सुन लो मुझे चाहने वालों ,
 छाती ठोक के कहता हूँ ;
जी,  मैं भी अपवित्र हूँ ।
 क्योंकि ,
 मैं भी किसी स्त्री के अंग विशेष्य से ,
 यूँ कह दूँ, अपनी माँ के अंग विशेष से 
 निर्गत हुआ।
 मैं भी किसी ,
ठीक उसके जैसे ही
किसी रज्ज विशेष से ही
मेरा भी निर्माण हुआ ।
तो, मैं भी अपवित्र हुआ ।
हाँ मैं भी अपवित्र हूँ ।
कि मेरा भी ठीक उसके जैसे ही 
किसी नारी के रज्ज के अंश से 
निर्माण हुआ ।।
            * छगन चहेता 

मुझे नहीं पता कि हमारे समाज में माहवारी या रजोधर्म के समय महिलाओं को अपवित्र क्यों माना जाता है ?
लोग दलीले देते हैं कि धर्म ग्रंथों में लिखा है , पर वास्तव में ऐसा कुछ नहीं है । बस धर्म ग्रंथों में इतना लिखा है कि महिलाओं को रजोधर्म के समय यज्ञ में नहीं बैठना चाहिए। जिसका कारण पवित्रता जैसा कुछ नहीं है ; बल्कि पुरातन समय में यज्ञ लंबे समय तक होते थे । जिससे महिलाओं को आग के पास ज्यादा समय तक बैठने से तकलीफ ना हो बस यही एक कारण है । जिसे ना जाने कुछ तुच्छ लोगों ने अपवित्रता के रूप में प्रसारित कर दिया ।
आमतौर पर देखा जाता है कि महिलाएं पैड को अपारदर्शी या ब्लैक पॉलिथीन में पैक करके ले जाती है । इसका कारण है, महावारी को हमने शर्म का मुद्दा बना दिया है । 
जिससे ना जाने कितनी ?  अधिकतर ग्रामीण परिवेश की लड़कियाँ रजोधर्म के शुरू होने के बाद स्कूल या कॉलेज जाना छोड़ देती है ।
 न जाने क्यों ? नारी भी अपने आप को महावारी के समय अपवित्र मानती हैं ।
शनी मंदिर की प्रथा सुनी ही होगी आपने , वैसी ना जाने कितने मंदिर मस्जिद है जहाँ नारी के प्रवेश को वर्जित किया गया है।
 यह सब गलत है  ; पता है , पर इसका विरोध कौन करें ?
 नारी तुम्हें ही करना होगा क्योंकि अन्याय तुम्हारे ही साथ हो रहा । बेशक मुझसे चंद लोग तुम्हारा साथ देंगे पर अगुवाई तुम्हें ही करनी होगी । रजोधर्म को अपवित्र नहीं आपका  विशेषाधिकार मानना होगा।
 हां बता दूँ,  अक्षय कुमार अभिनीत पैडमैन मूवी बहुत ही शानदार है । शायद यह भी एक कदम है इस रूढी को तोड़ने का । 
तो सब कोशिश करते हैं कि यह विशेषाधिकार नारियों के लिए शर्म की बात ना हो ।
कोशिश करें कि किसी बच्ची का स्कूल - कॉलेज रजोधर्म के कारण ना छूटे।
 हमारे टेक्निकल फ्रेंड भी कोशिश करें कि ऐसे पैड का निर्माण करें कि वह सस्ता मिल मिले । एक शोध के अनुसार पैड के अभाव के कारण महिलाओं द्वारा unsafe कपड़ा प्रयोग करने से उन्हें कई प्रकार के रोग होते हैं.,तो यह ना हो ।
इसी आशा के साथ चलता हूँ कि मेरी यह पहल रंग लाएगी,  चंद लोग, नारी - पुरुष भी मेरा साथ देंगे, ,,,देना ही होगा ।
पुरुष दे ना दे नारीयों को देना ही होगा । शर्म या कहूँ अपनी कमजोरी को त्यागना  होगा क्योंकि तखलीफ तुम्हें हैं ।
हाँ, मुझे भी हैं किसी की तखलीफ देखकर । अपनी तो तखलीफ आपने सहन करनी सीख ली पर मुझसे नहीं होती तो आप मुझे साथ दो।
आशा है दोगे , बस करना कुछ नहीं । खुद की रज्जोधर्म की शर्म त्यागों । ये अपवित्र कहने वाले को करारा जवाब दो । अपने साथ होने वाले,  हर अन्याय का खुल कर विरोध करो । बस मेरी मदद हो गई ।। शुक्रिया ।।

 फिर मिलेंगे किसी ने विचार नहीं रचना नहीं करती के साथ।।

 वैसे आप मुझसे कभी भी मिल सकते हो किसी नारी को सम्मान देने के विचार के साथ  , नारी को समानता की नजर से देखने वाली नजर के साथ,,,,,।।

Plz...अधिक से अधिक शेयर करें, ,,,
पहली बार शेयर की अपील कर रहा हूँ ताकि यह प्रथा,  ये नाजायज शर्म,  अपवित्रता का धब्बा मिट जाए, ,,कुछ मेरा काम भी हो जाए,,,so plz. शेयर करें, ,,,,
  Love to AL
                            * छगन चहेता 

Thursday, 18 January 2018

तुम्हारे पास क्या हैं? ,,,,,,,,,जवाब सच में कुछ नहीं सिवाय इतिहास के, ,,,

यह सवाल कितना कड़वा लगता है जब कोई विदेशी पूछता है और हमारे पास मौन के सिवाय कोई उत्तर नहीं, ,,,,सच में, ,,,सोच के देखों कि आप उपरोक्त पोस्टर पोस्ट करते हो और कोई टिप्पणी करता हैं - " तुम्हारे पास क्या हैं? " आपके पास जवाब हैं मेरे पास भी थे । लेकिन मेरे जवाबों की हकीकत पढ़ों फिर कोई जवाब हो तो मुझे जरूर भेजना, ,,,इन्तजार ।।।।
अब करते हैं कहानी शुरू, ,,,,,,,
बात तब की है जब मेरे साथ मेरे देशवासियों पर  देश भक्ति का रंग चढ़ा था ।  TV , सोशल साइट आदि तिरंगे के रंगों से रंगे थे सभी देशभक्ति से ओतप्रोत थे;  चारों ओर "भारत देश महान" की गूंज सुनाई दे रही थी । आजादी दिवस पास जो था ।
इसी दौर में मेरे किसी विदेशी दोस्त ने मेरी पोस्ट देखकर प्रश्न किया कि इतना उछल रहे हो,  आपके देश के पास है क्या ? तो मै देशभक्ति से ओतप्रोत  था ही कहा कि ये पूछ बेटा कि तुम्हारे पास क्या नहीं है? जो मेरे देश के पास है वह किसी के पास नहीं , इसकी खासियत की लिस्ट पढ़ते-पढ़ते तेरी सात पीढीयाँ  गुजर जाएगी  फिर भी पूरा नहीं पढ़ पाओगे ।
 उसने कहा- कुछ खास बता तो सही या यूं ही अपनी खोखली बातें सुनाता रहेगा।
 तो मुझे भी थोड़ा गुस्सा आ गया कि चल तुझे कल देश के विशेषताओं की लिस्ट भेजता हूँ।
 शाम को बैठा देश की विशेषताएँ लिखने । फिर मैंने उन  विशेषताओं का आत्म विश्लेषण किया तो हकीकत सामने आई मेरे मुल्क की,,,तो सोचा कि दुनिया को तो नहीं बता सकता पर हमवतनों को तो बताऊं कि हमारे देश के पास सचमुच में गौरवशाली इतिहास के सिवाय कुछ  नहीं हैं ।

ये कुछ देश की विशेषताएँ और उन पर मेरा यानी छगन चहेता का आत्मविश्लेषण ---
● मेरे देश में संस्कार है ।
छगन चहेता- सोचो क्या वाकई यह बात सही है ?
 क्या मेरे देश में संस्कार है ? यदि हाँ तो देश में इतने वृद्धाश्रम नहीं होते , माता-पिता बेटे के आश्रय को नहीं तरसते ।
● मेरे देश में नारी का सम्मान किया जाता है ।
छगन चहेता - सच है । दिल पर हाथ रखकर हर हिन्दुस्तानी सोचें । उत्तर मिलेगा,  नहीं । यदि उत्तर मिले हाँ , तो दामिनी हत्या ;  इन जैसी रोज अन्य ना जाने कितनी घटनाएँ, हमेशा लिंगानुपात का बढ़ता फासला, घरेलू हिंसा के बढ़ते आंकड़े , रोज सुनता बलात्कार जैसे कृकत्य ; यह सब क्या किसी और देश की बातें हैं । याददाश्त टटोलो, ,,,
 ●मेरेे देश में ताजमहल  हैं ।
छगन चहेता - कहते है कि मोहब्बत की निशानी है पर फिर भी हमेशा उसे किसी मजहब से जोड़कर देखा जाता है । इस पर भी हम लड़ रहे है ना।
●मेरे देश में दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है।
छगन चहेता - वही लोकतंत्र ना जिसके वोट,  नोट के दम पर मिलते हैं।  वही लोकतंत्र ना जिसे लालचतंत्र / डरतंत्र बोलना जायज होगा । यदि लोकतंत्र होता तो ऊँचेे - ऊँचेे ओहदों पर लोगों का खून चूसने वाले कीड़े ना होते । देश को बेच कर खाने वाले भ्रष्टाचारी नेता ना होते ।
● मेरे देश में धर्मनिरपेक्षता है ।
छगन चहेता - हर चुनाव में धर्म के नाम पर टिकटें बिकती हैं ।स्कूल में एडमिशन से पहले जाति , धर्म का पूछा जाता है। जिस देश में सिर्फ धर्म विशेष की ही राजनीति का होतीं है , उस को धर्मनिरपेक्ष कहा जाना कितना सही होगा।
● मेरे देश में भाईचारा है।
छगन चहेता - वह , यह मान भी लेगा कि हो सकता है पर एक अंतरराष्ट्रीय भाई  पाकिस्तान भी है ना , जिससे हम ना जाने एक दिन में कितनी दफा लड़ लेते हैं । सभ्य कहलाने वाले हिंदुस्तानी ही न जाने कितनी गाली एक पंक्ति में दे डालते हैं। ●मेरे देश में एकता है ।
छगन चहेता- किसी भी पुलिस थाने की FIR रजिस्टर देख लो न जाने कितनी भाई-भाई के बैर की रिपोटर्स दर्ज है।  यह तो उससे छुपा भी लूँ पर कश्मीर के अलगाव का मुद्दा तो जगजाहिर है।
अब सोचा क्या लिखुँ तारीफ में अपने देश की
¤ यह की एक सरकार है जो हर पाँच साल  में बदलती है ; उनका बदलना मानो भूत भागे तो प्रेत जागे जैसा है ।
¤व्यवस्था तंत्र के नाम पर एक भ्रष्टतंत्र है, टेबल के नीचे से धन जाएगा तो काम होगा नहीं तो चक्कर काटते रहो उम्र भर दफ्तर के।
● मेरे देश के पास गांधी के विचार है ।
छगन चहेता - जो सुनने को मिलती हिंसा  की खबरें , गांधी सर्कल के पास जमा कचरे के ढेर की तस्वीरें कहाँ का छुपाऊँ।
●मेरे देश के पास विवेकानंद जैसी युवा सोच है।
छगन चहेता - तो उन युवा सोच का क्या करूँ ? जिनकी सोच नारी की अस्मिता से ऊपर नहीं उठती , जो मेहनत से कतराते हैं ;  बस हर काम के शॉर्टकट अपनाते हैं । हिंसा , ईर्ष्या में ही जलते हैं ।

सोचा कि अपनी बिरादरी के लोगों की तरह उपमा-उपमेय व  इतिहास से विशेषणों का उपयोग कर ,  कविता का सृजन कर दूँ और उस परदेशी यार की बोलती बन्द कर दूँ ।
फिर सोचा कि क्या यह विशेषण सही में मेरे देश पर फिट बैठते हैं ? जवाब आया - ना ।
तो क्या यह मेरे आदर्शों का अपमान नहीं है ? यह तो उस सत्यवादी हरिश्चंद्र का अपमान होगा ।
 क्यों खोखली तारीफ में अपने दोस्त को दगा दूँ ?
भाड़ में जाए सच्चाई और ईमानदारी के उसूल, ,,क्या हैं चिपका देता हूँ, ,,मस्त सी , वीररस की कविता, ,,,यही तो हो रहा है अपने देश में । झूठी तारीफे । खोखले वायदें। तो अपने को कौनसी सत्यवादी की उपाधि लेनी है। चिपका डाल पर एक और प्रश्न उठा कि खुदा-न-खास्ता ,,,अगर       महिमा सुन मेरे देश की उसका भी मन कर दे, इस जमीन के जन्नत के दीदार का। आ जाए कभी मेरे मुल्क तो न्यूज़ पेपर में कौन-कौन से पेज छुपाऊँगा , कौन-कौन सा TV चैनल रोकुँगा । देश की हकीकत उससे कैसे छुपाऊँगा जिसमें है बस दंगों की आग , मजहबों  की लड़ाई ,  भाई-भाई का अलगाव , परदेस - परदेस का अलगाव , मियां बीवी के तलाक , सड़कों पर लूटती  औरत की इज्जत ,  कचरे-मजदूरी में बीतता बच्चों के बचपन का वसंत ।
घुमाने निकलूंगा ;  उसको दिखाने निकलूंगा ,  अपने देश का गौरव तो  रोते आम आदमी के आंसू कैसे पूछूंगा  । पानी को तरसती फसल ,  आत्महत्या करते किसान , उसकी नजरों से कैसे बचाऊंगा ।
 सड़कों की गंदगी को शायद वह इग्नोर(नजरअंदाज) भी कर दे पर परदेसी की औरतों के खुली जांघों पर पड़ती,  मेरे अपने ही देश के तथाकथित मर्दों की  गंदी नियत से कैसे बचाऊँगा ।
 दिखाने ले जाऊंगा मेरे देश के स्मार्ट शहर पर सड़कों  पर भीख मांगते गरीबों को कैसे हटाऊँगा ।
देख हकीकत मेरे देश की , वह जरूर मुझे मेरी कविता की याद दिलाएगा तब मैं अपने चेहरे को कहाँ छुपाऊँगा ।।

फिर रात भर सोचने के बाद सुबह उसको मैसेज किया कि ""भाई,,, था हमारा इतिहास उज्जवल जिस पर ही हमको गुमान है । नहीं है,  कुछ भी वर्तमान का गौरव हमारा । बस चंद अदीब ही  है भविष्य हमारा ।।""

 आएगा कभी वह मेहमान देश हमारे ,  तो बस आंखों पर पट्टी बांध , उसको इतिहासों के पद चिन्हों पर ले जाऊंगा । वही पर पट्टी खोल ; बस वही हमारा गौरवशाली इतिहास दिखाऊंगा । क्योंकि है नहीं दिखाने का कुछ भी हमारे पास गौरवशाली इतिहास के सिवाय । जो देश की हकीकत देख ली उसने तो फिर कैसे में हुंकार भरूँगा कि "भारत मेरा महान" " भारत मेरा महान""।
 बस यही आशा करता हूँ कि फिर से किसी राम , रहीम से चरित्र का , विवेकानंद से युवा , अब्दुल कलाम से व्यक्तित्व का निर्माण इस धरा पर होगा । फिर से विश्व गुरु का सपना हमारा साकार होगा । हर नारी  पूर्ण सम्मान , इज्जत की हकदार होगी । फिर से पूछे कोई कि क्या है तुम्हारे देश के पास ? तो फिर से ना किसी "छगन" को शर्मिंदा होना पड़े।  मेरे देश के पास भी इतिहास के अलावा गौरवशाली वर्तमान हो, सुनहरा भविष्य हो। आशा है कि उसको जवाब देने के लिए इतिहास से भी ज्यादा वर्तमान का वर्णन हो ।।


कुछ चीजें नहीं हो रही हैं पर होनी चाहिए पर शुरुआत कौन करें ? किसे शांति , सुख , इंसानियत पसंद नहीं पर फैलाने की शुरुआत कौन करें, ,   ,,?
☆चलो हम शुरुआत करते हैं दामिनी हत्या(बलात्कार) से कलंक मिटाने की, कश्मीर की आग बुझाने की , पाकिस्तान को गले लगाने की।। चलो कोशिशों की शुरुआत करते हैं । चलो चलते हैं दुनिया को शांति का पैगाम पहुँचाने, ,,हम से ही खुद से ही शुरुआत करते, इंसानियत अपनाने की।।

चलो चलाता हूँ दुनिया और भी हैं, ,,उनको अपनत्व,  प्यार बाँटने ।। फिर मिलेंगे किसी नई रचना,  विचारधारा के साथ ।।।
वैसे आप मुझसे कभी भी मिल सकते हो प्यार के पैगाम,  अपनत्व के अहसास , इंसानियत की महक के साथ ।।जय हिन्द ।।
भारत मेरा महान, ,,,,,,,भारत मेरा महान ।।।
#LOVE U ...#LoveToAll
#HowIWillChange but change_it's
#CHHAGAN_CHAHETA
                                 
                                        *छगन चहेता


 हिन्दुस्तान की हकीकत बँया करने वाली ऐसी तस्वीरों की Google जैसी साइटस् पर कमी नहीं हैं ।

Tuesday, 16 January 2018

छगन चहेता की कविता,,,,,,नन्हें खुदा के लिए ....

मेरा नन्हा खुदा-कपिल (भाणेज)Click by LAKHARAM 
कविता 
तेरी खिलखिलाहट , मुस्कुराहट
 पिगला लेती है पत्थर से भी दिल को
पता नहीं क्या जादू है तेरी मुस्कान में ।
आता हूँ थका- हारा घर
 फिर भी तेरी मुस्कान देख खुद को तरोताजा पाता हूँ
तू है वाकई कोई कण चुम्बक का तभी तो सारा परिवार इकट्ठा होता है तेरे परितः
जरुर तू  उथल-पुथल,  घर में उधम मचाता है;
 हर एक व्यवस्था की वाट लगाता है;
 फिर भी न जाने क्यों , तू ही दिल को चैन दिलाता है ।
जब सो जाता है तू, तो घर में शांति नहीं सन्नाटा होता है।
  तू जब ताली बजाकर जोरों से मुस्कुराता है ,
तब चाहता दिल की यहीं थम जाए यह पल
पर जानता हूँ ऐसा हो नहीं सकता,
 प्रकृति को कोई रोक नहीं सकता।
 सच कहूँ मेरे नन्हे खुदा तूने ही तो मुझे जीने का ढंग सिखाया है ।
करूँगा कोशिश की
तेरे बचपन के लम्हें  जीए तू जी भरके
खोने ना दूँगा तेरा बचपन इन स्कूली किताबों में
सिखाने की कोशिश करूँगा हुनर हाथों का
 सीखा न सकुँ न्यूटन, आइंस्टीन के नियमों को
समझा दूँगा खुश रहने के उसूलों को
 पढ़ा दूँगा पाठ  शिष्टाचार , सदाचार , संयम, समझदारी का
 बता दूँगा कि करना है सम्मान सदा हर नारी का।।
                                           * छगन चहेता
नन्हें खुदा से मेरे रिश्ते को दुनिया मामा-भांंजा के नाम
 से भी जानते हैं । धन्यवाद कपिल मुझे खुशनुमा जिन्दगी देने के लिए,,,,दिल से
♡ उस घर में क्या जरूरत पूजा की जहाँ नन्हें बच्चे रहते हो, उनसे थोड़ी देर खेल लो, मिल जाएगी वो खुशी जिसको खुदा भी तरसता हैं ।
♡ बस इसी आशा के साथ चलता हूँ कि कोई अपने बच्चों को आज के शिक्षा की अंधाधुँध दौड़ में ना दौड़ाए , बस उन्हें अपने -पराये की बजाय अच्छे-बुरे में भेद सिखाने की कोशिश करें ।
उन्हें सामाजिक  (मेरा मतलब जातिगत समाज से नहीं है) मूल्य सिखाने की कोशिश करें ।
 "मैंने यह नहीं कहां कि बच्चों को स्कूली शिक्षा ना दे या विज्ञान के नियमों को ना सिखाए परंतु सबकुछ सिखने के लिए नहीं होता,  आधारभूत शिक्षा आवश्यक रूप से दिलाए, आगे बच्चे की रूचि को तव्वजों दी जाए, ,,शायद यह बेहतर होगा बच्चे और हम सब के लिए .....भले ही किसी भी महान व्यक्ति का इतिहास देख लो....बाकी कौन किसी की बात मानता है तो फिर मैं क्या चीज हूँ ।
अंतिम बात अपने बच्चों को नारी का सम्मान करना जरूर सीखाए ...इस बात में कोई तर्क - वितर्क नहीं क्योंकि बच्चे के रूचि को तव्वजों ना देकर आप बच्चे के भविष्य को खराब कर रहें हो हाँलाकी मुझे यह भी कतई पसंद नहीं और नारी सम्मान की शिक्षा ना देकर आप पूरे समाज का भविष्य खराब कर रहें हो ।
¤ हर बच्चे से प्रेम करें क्योंकि बच्चे ही तो सच्चे इंसान होते हैं बतलाओ तो प्यार,  दूत्कारों तो बस मौन, ना नफरत ना द्वेष ।
वैसे बच्चों को डांटने वाले मुझे पसंद नहीं ।।
° ठीक है फिर मिलेंगे किसी नई रचना, नई विचारधारा के साथ
वैसे आप मुझसे कभी भी,  किसी भी समय मिल सकते हो बच्चे सी हँसी,  बच्चे सी अपनीयत के साथ .........#LOVE TO CHILDREN ....LOVE TO SMILE
#LOVE U & #LOVE TO ALL

Tuesday, 9 January 2018

अपनी असलियत, ,,कविताओं से,,,छगन चहेता की कविता;;;;

                           (1)
नहीं ढूंढता अपनी मोहब्बत ऊंचे ऊंचे बंगलो में  ,
हो सकता है वह रहती हो किसी शहर के छोटे से कोने में।

 नहीं ढूंढता अपनी मोहब्बत महंगी महंगी गाडी में ,
हो सकता है वह मिल जाए किसी गांव की पगड़ड़ी में।

 नहीं ढूंढता अपनी मोहब्बत हर एक हसीन चहरे में ,
 हो सकता है वह छुपी हो किसी खूबसूरत से दिल वाली लड़की में।।
                                * छगन चहेता

 
                        (2)
की होगी तारीफे न जाने कितनों ने तुम्हारे हुस्न की,
 किये होंगे वादे तेरे लिए चांद तारे लाने के,
 ताज के ख्वाब भी दिखाए होंगे ,
जान देने को भी तैयार होंगे बहुत सारे।
 पर मेरा वादा है इन सब से ऊपर ,
रहे ना किसी दिन ये नूरानी चेहरा, हुस्न की जवानी,
 तब तेरे चेहरे की झुर्रियों से भी रहेगी मेरी दीवानगी।।
         
                                 * छगन चहेता
 
                          (3)
जब मिली नहीं वजह मुस्कुराने की तो सीख लिया ,
बस यूं ही मुस्कुराना ,बस यूं ही गुनगुनाना ।
मत जलना मुझसे दुनिया वालों कि यह कैसे बिन मतलब के मुस्कुरा लेता है।
 आसान नहीं है यारों,  बस यूं ही मुस्कुराना ;
इसके लिए खुद को पागल की संज्ञा देनी पड़ती है।
   पागलपन  के  ताने भी सहने पड़ते हैं ।।

                                   * छगन चहेता

¤ कुछ चीजें ना छुपाई जाए तो बेहतर हैं ।
 वैसे मुझे गम के सिवाय कुछ भी छुपाने का शौक नहीं हैं, कभी कभी तो अपनों के सामने गम भी नहीं छुपा पाता हूँ ।
 
                                * छगन चहेता 

Monday, 25 December 2017

यही उम्र है, ,,सपनों को सजाने की.....

आपको नहीं लगता कि हम कुछ ज्यादा ही बदले बदले जा रहे हैं । हमारे सोचने- समझने हर काम को करने,  जीने का तरीका बदलता जा रहा हैं । हमारी पीढ़ी की किशोर और  नवयुवा पीढ़ी तनावपूर्ण जीवन जी रही हैं ।
यह उम्र होती है कुछ नया करने की अपने व अपनों के जीवन को खुश मिजाज बनाने की लेकिन पता नहीं हम क्यों प्रकृति के विपरीत जा रहे हैं। इस उम्र में कोई शिक्षा प्राप्ति की दौड़ में घोड़े की तरह दौड़े जा रहा हैं। तनाव और ललाट पर  सिलवटे लेकर और उम्र के सुनहरे पलों को खो रहा  हैं । क्यों ? क्यों ना हम अपना करियर अपनी पसंद के अनुसार चुने जिस काम को करने से दिल मना कर दे, उस काम को ना करें लेकिन दिल को जरूर पूछे कि तो फिर करना क्या हैं ।दिल की आवाज सुन कर तो देखें; सुनकर कितना मजा आता है ।

एक और बात आज का युवा आत्महत्या जैसे कदम उठा रहा
हैं कारण अधूरी 💔"लव स्टोरी''💔 ।  

  क्यों बेताब हो, उसे देखने को जिसकी नजरे हैं कहीं और भीड़ में से उसे देखो जो बेताब आपकी नजरो का।।

 क्यों रावण बनने की कोशिश कर रहे हो।।
 लैला हो तो भीड़ में से किसी मंजनू को खोजों ना।
 रांझा हो तो किसी हीर  को ढूंढो ना।
 लैला होकर रांझा की, मंजनू होकर हीर की चाह क्यों रखते हो।।
 यारो यह उम्र होती है,   कुछ नया करने की  और अपने सपनों को साकार करने की, लेकिन हम तो चेहरे  को सलवटो से भरने में बिता देते हैं ।
यही उम्र होती है जब हम घर से बाहर निकल,  कुछ अच्छा करने की चाह में दुनिया को जानने की कोशिश करते हैं।

 खुशियां तलाशने की कोशिश करते लेकिन सिगरेट , शराब में,,,,, , क्यों ?
खुशियां मिलती है अपनों के प्यार में , दोस्तों के साथ में और किसी अजनबी की याद में।।
 हम क्यों नहीं समझते कि खुशियां नहीं मिलती जो दूसरों के पास हैं , उसे हासिल करके।  अपने मन को मारकर।

 क्यों ना हम कभी अपने से बात करके,  अपने दिल की आवाज सुनकर  खुशी हासिल कर ले ।
क्यों चाहते हैं? उनको हम सफर बनाना।
 जिसका दिल है किसी और का दीवाना।
 अपनी नव जवानी में खुद ढूंढ लाओ ना किसी ऐसे अफसाने को जो ना सलवटे आने दे , ना जवानी जाने दे ।।

दिल से जवाब मांगो ना कि कोई तो ऐसा काम बता जिससे चेहरे पर तनाव लाए बगैर पेट में तनाव लाया जाए । बता दें सिर्फ एक काम।।
 फिर उस काम को कर के देखो तो कितना मज़ा आता है जीने में।।

इसी उम्र वालों के लिए बिन माँगी सलाह ••••••••
Girl friend 👫 & Girlfriend💑 ____
इन दोनों शब्दों में बहुत फर्क होता हैं जिसे हम अक्सर नजरअंदाज करते हैं ।
Girl friend - वह दोस्त , जो महिला है।
Girlfriend - वह महिला , जो आपकी प्रेमिका है।
 बस इसी गलतफहमी के कारण कई लोगों के दिल टूट जाते हैं । आपसे विपरीत लिंगी ने ज्यों ही दोस्ती की , आपने मन ही मन Girl friend  दो शब्दों के मध्य का रिक्त स्थान हटा नया शब्द या कहें कि नया रिश्ता बना दिया । फिर टैटू बनाने के बाद पता चलता हैं कि वो गैप सिर्फ हमारी ओर से मिटा था दूसरी ओर सिर्फ Girl friend ही है। फिर गम झेल सके तो नई खोज या गमों को भूलाने का प्रयास कभी शराब(शराब का सेवन सेहत को नुकसान पहुँचाता हैं ),  कभी सिगरेट🚬(धुम्रपान सेहत के लिए हानिकारक है)। उससे भी ज्यादा तो ब्लेड लेकर, ,,,,,या रस्सी, ,,,,,या कोई ओर तरीका, ,,,,,,,,,,,,यह सही नहीं हैं मेरे भाई / बहन / ,,,,,, सामने वाली के भी कोई ख्वाब होंगे,  उनका भी ख्याल रखो । दुनिया की हर पसंदीदा चीजें हमारे ही लिए नहीं हैं,  कोई ना  कोशिश जारी रखो; नहीं तो खोज तो करनी ही है जिन्दगी को नीरस मत होने दो।
महोतरमाओं आप भी  Girl की जगह Boy रखकर देख लो ।।
मैंने लड़कों का जिक्र इसलिए किया क्योंकि ये थोड़े ज्यादा ही  ,गलतफहमी में रहते हैं ।

तो चलो इस उम्र को खुशनुमा बनाएँ; ; हाँ मै भी।
जिनके यह उम्र बित गई वो भी जिस उम्र में है उसी का मजा उठाएँ क्योंकि हर उम्र का अपना मजा होता हैं ।

कभी समय मिले तो कोशिश करना कि जिनका सुनहरा बचपन मजबूरी की मजदूरी में खो रहा हैं । उन्हें भी थोड़ी सा इस उम्र का आनन्द दे , क्योंकि एक इंसान ही है जो खुशियों को फैला सकता हैं ।
 तो क्यों ना कभी इस हुनर का भी प्रयोग करके देखें ।
वाकई इस हुनर से संतोष,  खुशी नामक धन को बटोरा जा सकता है ।।
 इसी आशा,  इसी विचार,  इसी कोशिश के साथ चलता हूँ , फिर मिलने के लिए ..in next post. .

यूँ तो आप मुझसे किसी भी अच्छे विचार के साथ मिल सकते हो,,,,

                      ।।जय युवा शक्ति ।।
            ।।जय हर उम्र के अच्छे ज़ज्बातो की।।
                                                           * छगन चहेता

डायरी : 2 October 2020

कुछ समय से मुलाकातें टलती रही या टाल दी गई लेकिन कल फोन आया तो यूँ ही मैं निकल गया मिलने। किसी चीज़ को जीने में मजा तब आता है जब उसको पाने ...