Sunday, 26 November 2017

पदमावती फिल्म :मुद्दा विरोध जायज हैं या नहीं बल्कि मेरा मुद्दा यह है कि हम विरोध करने के काबिल हैं क्या?

आज हर तरफ पदमावती फिल्म का विरोध हो रहा हैं कारण बता रहें हैं कि फिल्म में हमारे गौरवशाली इतिहास के साथ छेड़ -छाड़ की जा रही हैं । यदि यह बात सत्य हैं तो जमकर विरोध होना चाहिए क्योंकि हमारे पास गर्व करने के लिए सिर्फ गौरवशाली इतिहास ही हैं ।बाकी जिस प्रकार हम चल रहें हैं उस हिसाब से हमारा वर्तमान और भविष्य दोनों के हालात ठीक नहीं दिख रहें हैं ।
     मैं यह नहीं कहता कि विरोध जायज हैं या नहीं बल्कि मेरा मुद्दा हैं कि क्या हम विरोध करने के लायक हैं?  आज हम उस महिला के लिए लड़ रहें हैं जिसने खुद की इज्जत अपने अद्मय साहस से बचा ली थीं । हमें आज हो रहें, महिलाओं के साथ बलात्कार, छेड़छाड़ जैसे घिनौने अपराधों पर चिंता नहीं हैं । दिल्ली के दामिनी हत्या के अलावा शायद ही ऐसी कोई घटना होगी जिसका फिल्म की तरह विरोध हुआ । दामिनी के उस दरिंदे को कम उम्र का बेतुका तर्क देकर छोड़ दिया किसी ने विरोध नहीं किया, क्यों?
 हमें चिंता हैं इतिहास की जिसका लौहा दुनिया मान चुकी हैं । किसी 2:00 घण्टे के चलचित्र(film)  के आधार पर उस अमर इतिहास पर लांचल नहीं आएगा । चिंता करो हमारे भारत के भविष्य की जो गर्त में जा रहा हैं । महिलाओं के साथ सरेआम, रोज कई अनेपक्षित घटनाएँ हो रही हैं । लड़कीयों का सड़कों पर निकलना दुभर हो रहा हैं तब क्या हमारे इतिहास, संस्कृति का मान बढ़ता हैं?  मुझे समझ नहीं आ रहा हैं कि मेरे रंगीले राजस्थान को क्या हो गया, वर्तमान और भविष्य की चिंता छोड़ इतिहास खंखाल रहा हैं ।
      शायद इतना विरोध हम नारी के होते अपराधों का करते तो आज हमारे देश की तस्वीर कुछ और होती। हम बस राजनीति, दिखावा करने की कोशिश कर रहें हैं हमें इतिहास, वर्तमान और भविष्य से कोई ताल्लुकात ही नहीं हैं । जो भी व्यक्ति इतिहास के साथ छेड़छाड़ का विरोध कर रहा हैं वो एक बार जरूर सोचे क्या हमारा वर्तमान सही जा रहा हैं ?क्या,  रोज समाचारों में मिलने वाली नारी अपराधों की घटनाओं का हमने कभी विरोध किया । यदि नहीं तो पहले यह संकल्प ले कि हम हमारे आस - पास होने वाली हर उस घटना का विरोध करेंगे जो नारी के सम्मान को ठेस पहुँचाती हैं । फिर  आपको लगता हैं कि कोई अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गलत फायदा उठा रहा हैं, ये फिल्म हमारे गौरवशाली इतिहास का अपमान कर रही हैं तो अहिंसा, संयम, शांति के साथ जमकर विरोध करो, हक से विरोध करो।
    क्योंकि अपणे मारवाड़ी मो एक कहावत हैं न कि "पेल पगो बळती बुझाणी पछे डुगर बळती जोणी ।" समझ्या के।।

।।जय राणी पदमावती ।। जय नारी शक्ति ।।जय राजस्थान ।।

                                     * छगन चहेता
                                   स्वतंत्र लेखक व कवि

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Saturday, 25 November 2017

छगन चहेता का लेख, ,,"दोस्ती, ,,,,"

यह है मेरी अच्छी गैंग,,,

दोस्त, दोस्ती ये मामूली शब्द लगते हैं लेकिन हर किसी के जीवन में बहुत मायने रखते हैं । कहते हैं कि इंसान दोस्त अपनी इच्छा से बनाता हैं लेकिन यह सच नहीं है बिल्कुल नहीं । शादी के जोड़े भगवान बनाता हैं की नहीं पर दोस्त जरूर भगवान ही बनाता हैं । किसी के चाहने से दोस्त नहीं बनते।

  मेरा अनुभव शेयर करूँ, मुझे उससे दोस्ती अच्छी लगती है, हम अच्छे दोस्त भी थे, लेकिन अब चाह कर भी नहीं है क्यों?  यही की हमारी प्रकृति अलग हैं मतलब आगे समझ आएगा । पास पास ही रहते हैं फिर भी कभी कभार ही मिलते हैं, कोई मतभेद नहीं बस यूँ ही।
   
         जिंदगी में कितने लोग मिलते हैं, अपनी जिंदगी का ना जाने कितना समय उनके साथ बितता हैं । फिर भी वे हमारे अच्छे दोस्त नहीं बन पाते और दूसरी तरफ राहो की चंद समय की मुलाकात में घनिष्ठ मित्र ,हमसफर बन जाते हैं । कभी सोचा क्यों? कोई तो ऐसी अनजानी शक्ति होती हैं जिसके कारण कहीं से भी हमारी प्रकृति का दोस्त हमको मिल ही जाता हैं ।

   कभी आप हाथ बढ़ाए और सामने वाला दोस्ती से इनकार कर दे तो परेशान मत होना, अपने आप में कमी मत ढुढ़ना कि कुछ खोट हैं हममें बल्कि chemistry याद रखना, समान - समान को ही घोलता हैं । आपकी और उसकी प्रकृति अलग हैं खोट किसी में नहीं । मिल जाएंगे अच्छे दोस्त बिन खोजे ही बस इन्तजार किजिए। निराश ना होना,  बस हताशा ना होना ।

       हम माता, पिता, भाई, बहन, पति, पत्नी हर सामाजिक रिश्ते के कर्जदार होते हैं लेकिन दोस्ती एक ऐसा बंधन हैं जिसमें पसंद आए तो हाय! नहीं तो बाय!
   यदि हम दोस्ती कृत्रिम रूप से करेंगे तो साथ तो होगा, टाइम पास भी होगा पर वो बात नहीं होगी, भावनाओं का समान नहीं होगा । ऐसे लोग  use  करेंगे, मतलबी होंगे । जैसे राजनीतिक दोस्त होते हैं । फिर अंत में सिर्फ हमें पछतावा मिलता हैं ।

      दोस्ती उसी से करो जिससे होती हैं, करनी नहीं पड़ती हैं, जिसमें दिमाग चुप और दिल सोचें; जिसमें बोलने से पहले यह सोचना ना पड़े कि दोस्त नाराज तो नहीं होगा । जिसमें दोस्त से मिलने जाए तो दर्पण देखकर यह विचार ना आए कि दोस्त के सामने अच्छा दिखुँगा की नहीं । दोस्ती वो होती हैं जिसमें टुटने का विकल्प ही ना हो। दोस्ती कैंटीन में नाश्ता करवाने से नहीं होती, दोस्ती वो होती हैं कि चल तू भूखा हैं तो मैं भी नहीं खाता । तू पैदल हैं तो मैं भी गाड़ी से नहीं जाता ।

                        * छगन चहेता


और भी कुदरती दोस्त हैं मेरे लेकिन हम कभी एक साथ, कैमरे की एक ही फ्रेम में नहीं आए,,,,क्यों? 
क्योंकि उनसे बातें करने से ही फुर्सत नहीं मिलती ।
My all natural friends...love you

Friday, 24 November 2017

छगन चहेता की शायरी,,,,,,,


कैसे कहुं तन्हा खुद को
सनम तेरी बेवफाई जो साथ हैं ।

नारी - पुरुष का भेद देखा भाषा में,
बदचलन नारी को  "वेश्या" कहा
बदचलन पुरुष पर मौन धरा।

आन से, बान से, स्वाभिमान से रहना
पर किसी रोज अपनी औकात से ना निकलना ।

चला था खुद को खुदा साबित करने
पर खुदाई के इम्तहान मे खुद को इंसा भी साबित कर न सके।

दूर से ही लगा लेते होअंदाजा , हमारे बुरा होने का
खुद से फैसला कर लेते हो हमसे ना मिलने का
पर करके देखो कभी गुप्तगु हमसे
होके देखो कभी रूबरू हमसे
पछतावा ना हो अपने फैसले पर ,तो कहना ।

पढ़ी थीं जो कहानी किताबों में
वो हुआ है आज हकीकत में
जिंदगी की दौड़ में, खरगोश की चाल से,
मिलीं हार कछुए से
अफसोस हैं इस बात का
खरगोश हार कर भी सीख दे गया
मैं दौड़ कर भी जीत न पाया ।

इस मतलबी दुनिया से भर आया था मन इक दिन,
पर शुक्रगुजार हुँ खुदा का कि ,आप मिल गये उस दिन ।
                                               
                               * छगन चहेता
          

Thursday, 23 November 2017

छगन चहेता की कविता, ,,,,

दोस्तों हमेशा whatsapp पर  good morning का मैसज हर रोज ना कर सको तो कोई बात नहीं ।
 FB पर मेरी post like नहीं कर सको तो कोई बात नहीं ।
किसी खुशनुमा पल में मुझे याद ना कर सको तो कोई बात नहीं ।
पर अगर मिले कभी हम राहो में तो हाथ मिला लेना ।
लगे कभी दुनिया बेगानी तो बस हमें बता देना ।
ये "अपना" तुम्हें कसके गले लगा लेगा,
अपनी सारी खुशियाँ तुम पर लुटा देगा ।
                         
                            *छगन चहेता 

Wednesday, 22 November 2017

छगन चहेता की कविता "परिंदा, ,,,,,,,,,,,"

   "       कविता       "
  उड़ने दो इस परिंदे को,
देखने दो जहां इस परिंदे को
हैं नहीं ये परिंदा आप मतलबी
समेटेगा खुशियाँ तो तुम्हें भी बाँटेगा ।
क्यों आतुर हो पर काटने को
क्यों बेताब हो इसकी उड़ान रोकने को
लाएगा चार दाने तो तीन तुम्हें भी खिलाएगा ।
करता हैं ये परिंदा वादा
खाएगा न कभी किसी के हिस्से की
जरूरत पड़ीं तो ,आपको भी खिलाएगा खुद के हिस्से की।
करेगा दुआ कि आये ना गम कभी किसी के हिस्से में
पर आ भी जाए गम आपके हिस्से, तो ये  ले लेगा खुद के हिस्से ।
                             *छगन चहेता 

छगन चहेता की कविता, ,,,,,आधुनिक शिक्षण संस्थानों पर, ,

 पढ़ा था किताबों, अखबारों में
देखा  TV,न्यूजों में
चिंता जताते चिन्तको को
कि चढ़ रहा है भूत पाश्चात्य का
भूल रहें हैं संस्कृति भारत की
पर हुआ नहीं विश्वास कि ये सच भी हैं
था भरोसा एक शिक्षा के संस्थानों पर
कि जब तक ये हैं हम भूल नहीं सकते
भारत की मूल मर्यादा को।
पर तोड़ दिया वो सब भ्रम विश्वासों का
हो गया विश्वास किताबों, अखबारों, TV के शुभचिंतकों पर
जब शिक्षा के मंदिर से ही निकाल दिया हमें, मुनाफा ना होने पर ।
तब याद आ गई अग्रेंजों की नीति, लुटो और बर्बाद करो
कुछ भी हो जाए ग्राहक का,पर अपनी जेब गर्म रखों।
था नहीं कभी कपड़ों की मान-मर्यादा का जिक्र हमारी संस्कृति में,
 विश्वास, विचारों की ही बातें थीं
जो आपने मुल - जड़ों से ही उखाड़ दी ।
होने गया विश्वास उन बड़े सयानो की बातों पर
कि गोरे अंग्रेज तो चले गये पर गुण अपने छोड़ गये ।
 इन संस्थानों में बातें होती हैं मैकाले नीति हटाने की
पर यहीं चल रही है नीति मैकाले के ही वंशज की।
  भरो जेब अपनी इसमें कोई हर्ज नहीं
पर मत भटकाओ उस राही को जिसका आपसे कोई बैर नहीं ।।
हम तो भूल भी जाएंगे, हमें घाव सहने की आदत जो है।

आने वाली पीढ़ी के लिए

एक बार फिर जताता हुँ विश्वास कि ,अपनी भूल पर पछतावा होगा
इस काॅलेज में भी तक्षशिला से विद्वानों का उत्पादन होगा ।
निकलेगें यहाँ से भी विवेकानंद से युवा,
जो विश्व का उत्थान करेंगे ।
विश्वास हैं कि बिजनेस नहीं, फर्ज मानकर शिक्षा का विकास होगा
आने वाले हर विद्यार्थी का सपना साकार होगा
विश्वास फिर जताता हुँ कि फिर विश्वासघात नहीं होगा ।।
                       
                                   *छगन चहेता

Wednesday, 8 November 2017

छगन चहेता की कविता "दोस्ती, ,,,,,"



          ::कविता ::

हो गई हैं मंजिले जुदा यारों
राहो में ही बिछड़ गये ।
अब वो हर बात तो होगी
पर वो जज्बात कहाँ ।
अब भी महफिले जमेगी
गजलें भी बनेगी
पर यारों, आप जैसा शायराना अंदाज कहाँ ।
टीचर भी होंगे, किताबें भी होगी
पर पढ़ने का वो माहौल कहाँ ।
दोस्त भी होंगे, दोस्ती भी होगी
पर यारों, आप जैसा याराना कहाँ ।
बातें भी होगी, यहाँ की,वहाँ की,सारे जहाँ की
पर यारों, आपके लब्जो सी आवाज कहाँ ।

बहुत याद आयेगें
वो अभि की शैतानियाँ,शायरीयाँ
वो अब्बास की उलझने
वो लाखु की नादानीयाँ
वो पूनम सी बहना(sister)
वो साहिल की biology
वो रईस की mythology
वो दिनेश(Rajpurohit)के सीरियस अंदाज वाले मजाक
वो रहीम के सपनों की बातें
बहुत सताएगी

पर क्या करें यारों, दुनिया की बताई राहो पर चलना तो पड़ता हैं
कुछ पाने के लिए कुछ खोना तो पड़ता हैं ।
पर नहीं था पता कि यूँ मिल के बिछड़ जायेंगे
उस खंडहर सी मंजिल की दौड़ में
जिसे पाना शौक नहीं, शान नहीं
बस मजबूरी हैं ।
कह दो तो चल भी दूँ तुम्हारी राहो पर साथ तुम्हारे
पर क्या फायदा, तुम निकल जाओगे आगे मंजिल पाने के बाद
इसलिए, मैं भी चल पड़ा हुँ अपनी राहो पर
क्योंकि सुना है कि राह नहीं मिलती
खुद कभी खुद से
पर राहे अक्सर मिल जाती हैं
इक-दुजे से चौराहे पर
इसीलिए ही,मैं भी चल दिया, अपनी राहो पर ताकि
कभी हम राहो में मिले ना मिले
चौराहों पर जरुर मिला करेंगे ।।
                     *छगन चहेता
For my all Bsc.Ist(bio) Friends

Tuesday, 7 November 2017

छगन चहेता की कविता "जो हुआ हैं सीमा पर शहीद, ,,,,,,"

 सेना के सैनिक हमारे लिए भगवान समान हैं जिनकी वजह से हम शैतानों से सुरक्षित है।।

            ::  कविता ::

 जो हुआ हैं सीमा पर शहीद
वो भी तो माँ का लाड़ला होगा
किसी की गोदी को उसका भी इन्तजार होगा ।

जो हुआ हैं सीमा पर शहीद
वो भी तो किसी बहन का वीरा होगा
किसी की राखी को उसका भी इन्तजार होगा ।

हुआ हैं सीमा पर शहीद
वो भी किसी का पिया होगा
किसी की माँग को तो उसके सिन्दूर का इंतजार होगा ।

हुआ हैं सीमा पर शहीद
वो भी किसी पिता का प्यारा होगा
किसी के बुढ्ढे कंधों का सहारा होगा ।

हुआ हैं सीमा पर शहीद
वो भी किसी का बाबुल होगा
किसी को तो उसके छाया की भी जरूरत होगी ।

हुआ हैं सीमा पर शहीद
उसके भी अरमानों का कुछ मान होता तो होगा
उसका भी कोई सपनों का संसार होता तो होगा ।।
               ।।जय जवान ।।।
                                     *छगन चहेता
Really, I am love .....Indian Army

Saturday, 4 November 2017

छगन चहेता की कविता "अस्पताल में जाकर, ,,,,,,,,,,"

 अस्पताल इन्सान का आईना होता हैं, यहाँ इन्सान की सच्चाई साफ दिखती हैं ।।।।।

                 कविता

लगे कभी माँ जीवन में बोझ
तो जननी वार्ड में प्रसव पीड़ा से कहराती
किसी माँ को देख लेना ।

लगे कभी अपनों में परायापन तो
किसी मरीज के पास खड़े परिजनों को देख लेना ।

हो कभी खुदा की खैर पर शक तो
जीवन की दुआ मांगते
बीमार लोगों को देख लेना ।

हो कभी भाई के प्यार पर शक तो
अस्पताल में राखी सम्भालते किसी के भाई को देख लेना ।

हो कभी पापा के प्यार पर शक तो
डाॅक्टर से मिन्नते करते किसी के बापू को देख लेना ।

हो कभी अपनी जवानी पर गुरूर तो
किसी वार्ड में तड़पते  वृद्ध को देख लेना ।

लगे कभी की जरूरत नहीं किसी की सिवाय दौलत के तो
मृदाघर में सड़ती किसी लावारीस लाश को देख लेना ।

करनी हो औकात पता अपनी तो
किसी अस्पताल में जाकर देख लेना ।
                        *छगन चहेता 

Thursday, 2 November 2017

छगन चहेता की कविता, ,,"पापा, ,,,,,,,"

कुबेर तो नहीं
कुबेर सा खजाना हैं, पापा

आसमान तो नहीं
आसमान सा छत हैं, पापा

पहलवान तो नहीं
पहलवान से रक्षक हैं, पापा

खुदा तो नहीं
फिर भी हर ख्वाहिश पूरी करते हैं, पापा

गौतम बुद्ध तो नहीं
फिर भी हर गलती की माफी देते हैं ,पापा

महर्षि दधिची तो नहीं
फिर भी हमारे लिए अपने सुख त्यागते हैं ,पापा

जज से हैं
फिर भी फैसला नहीं, सलाह सुनाते हैं, पापा

जेलर से हैं
फिर भी सजा से नहीं, प्यार से समझाते हैं पापा ।
                                          *छगन चहेता


डायरी : 2 October 2020

कुछ समय से मुलाकातें टलती रही या टाल दी गई लेकिन कल फोन आया तो यूँ ही मैं निकल गया मिलने। किसी चीज़ को जीने में मजा तब आता है जब उसको पाने ...