Tuesday, 27 November 2018

मीनल

वो अपने काॅलेज के बगीचे में दोस्तों को कविता सुना रहा था । उसे पीछे किसी के आने का आभास हुआ । उसने मुड़कर देखा तो मीनल थी ।
वह चहका, ओह्ह! आओ मीनू ।
उसने सरककर मीनल को बैठने की जगह दी और यकायक वहाँ से उठकर चला गया ।
रीमा, उसे एवं देवा ने मीनल को देखा एवं फिर एक-दूसरे की ओर देखकर , ओठों के अन्दर हँसे । फिर गंभीरता के साथ मण्डली बिखर गईं ।
उसने घर जाकर वाट्सएप देखा तो मीनल के कई संदेश आये हुए थे ।
क्या हुआ ?
ऐसा मैंने क्या किया ?
गलती तो बताते ?
और ढ़ेर सारे "?" के चिन्ह
?
?
?
उसने देखकर (seen) छोड़ दिया, कोई उत्तर नहीं दिया । मीनल फिर उदास इमोजी, उदासी भरे गाने भेजती लेकिन वो फिर भी कोई प्रत्युतर नहीं देता ।
काॅलेज में गुड मॉर्निंग से उसका अभिवादन करता, मुस्कुराकर जवाब भी देता लेकिन फिर भी एक अलगाव सा रखने लगा । वो हमेशा कोशिश में रहता कि दोस्तों के साथ ही रहूँ ताकि मीनल से अकेले में न मिल पाए ।
सोशल मीडिया के संदेशों एवं काॅलेज में वैसे ही रवैये के बीच लगभग डेढ़ महीना बीत गया । वो मंडली में बैठा कोई कविता सुना रहा था कि पीछे से मीनल ने आवाज दी
ओ ! इधर आओ ।
कौन ? मैं ?
हाँ, तो और कौन?
मीनल के आवाज की गम्भीरता को देखकर वो चुपचाप उसकी ओर चल दिया । वह पास गया तो देखा कि मीनल की आँखों में पानी हैं ।
अरे! मीनू क्या हुआ ? आओ बैठो । तुम भी न यार ।
वो दोनों बैच पर बैठ गये ।
मीनू, ऐसा नहीं है जैसा तुम सोच रही हो । तुम मेरी सबसे प्रिय हो । लेकिन मैंने कहानियों में कही पढ़ा है कि जो चीजें हम प्यार के नीचे दबा देते है वो एक अरसे बाद फिर जाग्रत हो जाती हैं जो प्यार और इंसान दोनों को अन्दर से तोड़ देती है ।
मैं देख रहा हूँ कि तुम अब अपने दोस्तों के साथ उतना चहक कर बातें नहीं करती, मजाक नहीं करती हो । तुम सिमट सी गई हो जैसे तुम्हें लगता हो कि तुम्हारी किसी बात या रवैए से मुझें बुरा न लग जाए और मैं नहीं चाहता कि तुम खुद को खो दो, अपनी प्रकृति खो दो ।
यह सही है कि प्यार समर्पण माँगता है लेकिन त्याग भी हो जरूरी नहीं ।
बस तुम उस पवित्र भावना को अटल रखना जिसे प्यार कहते है । इतना अटल कि वो किसी भी दूसरे मैत्री भाव से डगमगाए नहीं ।

यही सब, मैं खुद को भी इतनें दिनों से समझा रहा था कि प्यार को असल में अब तक हमने समझा नहीं है । प्यार का हक है कि वो हर समस्या या उलझन में तुम्हारी और आशा, साथ कि नजरों से देखें मगर प्यार जकड़न नहीं है एक स्वच्छंद जहां है ।
वो उठकर कैन्टीन में चला जाता है और मीनल मण्डली को उसकी लिखी कविता सुनाने लगती है । घर जाते ही वो मीनल के ढ़ेरों सवालों का एक जवाब देता है ।
"प्यार हो गया है"

छगन कुमावत "लाड़ला"©

तस्वीर: मेरे द्वारा किसी शाम ली गई ।


Saturday, 17 November 2018

बिखराव - प्रेम का


खुद को समेट पाना मुश्किल होता जा रहा है, जितना देखता जा रहा हूँ । उतना ही खुद को हिस्सों-हिस्सों में बांटता जा रहा हूँ और अब इस नियति में भी ढलता जा रहा हूँ ।
अच्छे-बुरे में भेद तो हो पा रहा है मगर सबसे अच्छे की पहचान खोता जा रहा हूँ ।
कहीं जाता हूँ तो खुद को थोड़ा उसके नाम भूल आता हूँ , किसी से मिलकर आऊँ तो कुछ उसका भी हो जाता हूँ । किसी को भुला नहीं पाता हूँ अपनी जिज्ञासा, तृष्णा को मिटा नहीं पाता हूँ ।
इसका आशय, शायद यह नहीं कि अपने शहर का प्यार उस शहर को दे आया ।
तुम्हारी मोहब्बत का हिस्सा उसे दे आया,,,
प्रेम जैसी किसी मानवीय भावना पर विश्वास करों तो पूर्णतः करना । ये सतत् वृद्धि करता रहता है ना कि टूटता है ।
फिर भी तुम चाहों कि नहीं, मैं बस तुम तक ही सिमट जाऊँ तो मुझे तुममें सिमट जाने से भी कोई ऐतराज नहीं ।
तुम में सिमटते-सिमटते, मैं शुन्य सा हो जाऊँगा जो गणित का होकर भी संक्रियाओं में नही आता । उसको किसी के साथ जोड़ने या घटाने से कोई फर्क नहीं आता ।
इस तन के मन के लिए जरूरी है कि सजीव-निर्जीव सबको प्यार बांटता रहें, उनके अद्भुत अहसास को महसूस करता रहें ।

मैं सिर्फ परिणामों से वाकिफ़ करवाना चाहता हूँ । ना इससे डर है ना अविश्वास ।
चीजें जान लेना जरूरी है अमल में लाना या नहीं यह स्वविवेक है ।

यह तस्वीर जयपुर के हवामहल के एक खिड़की की है । सामने की खिड़की नहीं है पार्श्व की है । कितनी नज़रों ने इसके पार का नज़ारा देखा होगा मगर मुझे इसके पार देखने से मोह सा हो गया,,, इसके पार निर्माणाधीन ब्रिज के अलावा कुछ न था फिर भी औसतन बड़ी देर तक देखता रहा, जैसे मेरा कुछ रह सा गया हो ।

छगन कुमावत "लाड़ला"©

{तस्वीर: 15 सितम्बर 2018 जयपुर भ्रमण के दौरान की }

Thursday, 8 November 2018

चंद पल,,

तस्वीरें  बस मौन बँया करती है,,
Click by LAKHA RAM 
"बिखरे ख़्यालों में न जाने कौनसा ख़्याल टीस दे जाए, न जाने कौनसा अन्दर तक गदगद कर दे ।"
वो आगे के सफ़र के लिए रेलगाड़ी के इंतजार में प्लेटफार्म पर टहल रहा था । वक्त जाया करने के जुगाड़ में कई अनजाने चेहरों से बातें भी हुईं होगी, ठहाके भी लगें होगें जिसमें से ठीक-ठीक कुछ भी याद नहीं लेकिन वो चंद पल उसे याद है जस के तस ।
वह उस लड़की के सामने से गुजरा तो वह मुस्कुराई । उसने चारों तरफ देखा कि वह उसकी ओर ही मुस्कुरा रही है । थोड़ा ठहरकर वह भी बेढ़ग सा मुस्कुराया और चेहरा झुकाकर आगे बढ़ा, काफ़ी आगे जाने के बाद मुड़कर देखा और बहुत आगे चला गया जहाँ से उसे देख भी न पाए ।
उसने चाहा क्यों नहीं कि वो उसके सामने की बेंच पर बैठ जाए, वक्त है तो ठहर जाए ।
वह वहाँ से फ़ौरन निकला क्योंकि उसे बस मुस्कुराहट अपने ज़ेहन में कैद करनी थी । चेहरा या उसकी कोई और भाव-भंगिमा को आड़े नहीं आने देना चाहता था ।
वो चंद पलों के इश्क़ को अनंत समय के लिए लेकर चला आया ....
वो भाषा, व्याकरण के परे प्यार और मोहब्बत में भिन्नता प्रदर्शित करता रहा है जिसकी बदौलत वो उस लड़की से हर इंसान की भाँति प्यार करता है और उसकी उस मुस्कुरान से मोहब्बत करता है जिससे खुद को ऊर्जावान बनाता है ।

प्यार के इतर किसी इंसान से इश्क़ करना,,, इस पर वो चुप है, मौन है मगर भावनाओं, अहसासों से बेइंतिहा मोहब्बत है जिसे यदा-कदा लिखता रहता है बेढ़गी श़ेर-ओ-शायरी में ...


छगन कुमावत "लाड़ला"©

Monday, 22 October 2018

किस्से कोटा के...


कोटा. रेलवे प्लेटफार्म के आखिरी बेंच पर बैठा लड़का, जो इस शहर को छोड़ रहा है । जिसमें वो पिछले एक साल तक रहा ।
एक साल काफ़ी है या नाकाफ़ी, किसी शहर को जानने के लिए , यह अनुमान लगाना बचकानी हरकत होगी ।
शायद हरेक के लिए यह शहर उतना विचित्र नहीं होगा जितना उसे लगा । उसका पश्चिमी राजस्थान के देहात से यहाँ आना और इसे जीना एक विचित्र, अनोखा अहसास था , खासकर किशोरावस्था के प्रारम्भिक दौर के कारण ।
उसने किशोर दिलों के उछलते जज्बातों को देखा, उनकी हसरतों को देखा ।
प्रेमजाल से ढ़के शहर में भी वो अप्रेमी रहा हालांकि वो कभी अप्रेमी नहीं था । उसने हमेशा जहाँ-तहाँ प्रेम का इजहार किया लेकिन वो प्रेमजाल वास्तविक रूप से अप्रेमजाल था जिसमें वो प्रेमी होकर भी अप्रेमी प्रतीत हुआ ।
उसने कभी किसी के प्रेम पर अंगुली नही उठाई मगर अगले दिन अखबार में नसें काटने की खबर में उसका नाम पढ़ता है तो उस प्रेम को दुत्कारता है बल्कि सिरे से खारिज करता है , उसके प्यार को ।
जो प्रेम टूट जाए असल में वो किसी भी तरफ से प्रेम नहीं होता है वो क्षणिक आनन्द के प्राप्ति का मद/नशा होता है जिसमें हम चूर हो जाते हैं । उतरने पर गलती का आभास होता है जो कभी-कभी जिन्दगी से भी बड़ी लगती है परिणामस्वरूप मौत चुन ली जाती है ।
उसे इससे भी बड़ी चोट , वो खब़र पहुँचाती है जो मौत का कारण "असफल प्रेम" बताती है ।
प्रेम को यूँ बदनाम करना कतई सही नही है । प्रेम, प्यार कभी असफल नहीं रहे । सीता का प्यार धनुष उठाने में, रावण को मारने में असफल नहीं हुआ । मांझी का प्यार पर्वत तोड़ने में असफल नही रहा ।
प्यार के इम्तिहान में दर्द, जुदाई सब आ सकते है लेकिन परिणाम कभी असफल नही आता है अगर आता है तो उसे प्रेम समझना भ्रम है ।
इस शिक्षा नगरी कोटा के बारे में कहने को उसके पास बहुत कुछ था लेकिन ट्रेन आ चुकी थी । अपने प्यार के सिवाय वो सबकुछ ट्रेन में लाद रहा था ।
इस रंगीन शहर के गहराई में उतरने के बाद भी वो अपने ही रंग में रंगकर घर की ओर जा रहा था ।

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कई किस्से हैं इस अतरंगे शहर कोटा के, बाकी के फिर कभी ।
शायद कुछ था कोटा का जो वह अपने साथ भूल से ले आया था, लौटाने जाना है ।

छगन कुमावत "लाड़ला"©

Friday, 21 September 2018

ढ़लती शाम ...

तस्वीर सुजेश्वर पहाड़ी के शिव मंदिर से , उस दौरान लाखाराम ने ली थी जब मैं, हेतु लिम्मा व लाखा राम के साथ वहाँ गया था ।

उसकी कक्षा का अन्तिम कालांश हमेशा खिडक़ी से बाहर झाँकने में ही व्यतीत होता ।
दरअसल उसका अन्तिम कालांश हमेशा से ही खाली रहता है । पहले पहल मन ही मन विद्यालय प्रबंधन को कोसता "साले घर जाने क्यों नहीं देते, फोकट के बैठा के ही तो रखते हैं ।"
इस समय सारी कक्षा आपस की बातों में मशगूल हो जाती मगर वो शामिल नही होता क्योंकि दो तरह के दोस्त होते हैं, एक जो पढ़ाई की बातें करतें हैं जिससे अब तक वो ऊब चुका होता है । दूसरे इधर-उधर की करते हैं, उससे उसे कोई समस्या नहीं होतीं मगर वो धीरे-धीरे, अपनी किशोरावस्था के मद में वहाँ तक पहुँच जातें हैं जहाँ , उसकी तहजीब जाने नहीं देती ।
उन्हीं बेहूदा चीजों से बचने के लिए । उसने खिड़की के पास वाली बेंच पर बैठना प्रारंभ किया जो अक्सर खाली ही रहती थी । जिसके दो कारण थे । एक तो चाॅक की डस्ट बहुत आतीं थी । दूसरा, बेंच के ऊपर लटकते खराब पंखे पर बैठने वाले कबूतरों का आतंक ।
ज्यों ही अन्तिम कालांश लगता । वो खिड़की के पास आकर बैठ जाता । सामने वो पाठ खोलकर रखता जो उसे याद होता ताकि सजा से बचा जा सके क्योंकि विद्यालय में ऐसा प्रचलन है कि खाली कालांश में बच्चा जो पेज खोलकर बैठा है उसमें से सवाल पूछों, जवाब मिलें तो ठीक नहीं तो दे पीठ पर धीक(मुक्का)।
आज वो अपने विद्यालय की दूसरी मंजिल की उस खिड़की से , इस देहाती शहर के दूसरे छोर पर स्थित सबसे ऊँची पहाड़ी को देख रहा था जिस पर शिवालय बना हुआ है ।
सोच रहा था । काश! किसी दिन जल्दी छुट्टी मिल जाए तो वो दोनों यहाँ से सीधे वहाँ, उस पहाड़ी पर जाएँ । इतनी तेजी से दौड़कर जाएँ कि सूर्य क्षैतिज के आँचल में समा भी ना पाए । हाँफते हुए वहाँ पहुँचे और शिवालय की पिछली दीवार पर बैठकर विशाल सूरज को बेहद शीतलता से छोटी छोटी पहाडियों की ओट में समाते हुए देखें । गर्म हुईं उनकी साँसे , इस सर्द शाम को ऊष्मा प्रदान करें जिससे वातावरण और भी सुहाना हो जाए ।
उस दिन ना शिवालय के आरती की आवाज़ आए ना तलहटी में स्थित मस्जिद से अज़ान की आवाज़ आए । कानों में कुछ सुनाई दे तो सिर्फ नीड़ो की तरफ लौटते पक्षियों का कलरव, घरों की तरफ लौटते चरवाहों व पशुओं के कदमों की आवाजें ।
यह मानवीय चुप्पी टूटे तो बस उसके इस प्रश्न से कि प्रेम क्या है ? प्रेम, इस पर सोचा न जाए तो बेहतर है मगर फिर भी, यह वो आलौकिक भावना है जिसमें हर कार्य में स्वहित से पहले पर हित को रखा जाता है ।
यह सोच रखी जाती है कि उस पर मेरा अधिकार हो न हो , मुझ पर उसका सम्पूर्ण अधिकार है और जब दोनों और से एक ही भावना एक दूसरे के लिए विकसित हो तो प्रेम जीवित होकर तुम्हें जीने लगता है ।
यूँ ही बातों-बातों में रात गहरा जाए। अब तक साँसे ठण्डी हो जाए । उनके दरमियां दूरी कायम रहे भले तापमान गिरने लगें मगर वो अन्तर्मन से इतनें जकड़ जायें कि कोई एक उस दीवार से फिसल कर पीछे की अन्धी, गहरी खाई में गिर जाए तो दूसरे के प्राण भी उसी के साथ सदा के लिए घने अन्धेरे में कहीं खो जाए ।
सुबह के उजाले में दिखे तो बस एक बुत, साँस विहीन शरीर । जिस पर हो अनेकों सवाल, उसके खान-पान से लेकर उसके चरित्र तक ,, हरेक पर हो कईं सवाल । जिसकी पुष्टि की जिम्मेदारी हो , डाक्टरों व पुलिस के कंधों पर मगर उनके वैज्ञानिक यंत्र व विकसित सोच चुप्पी साधे रहे । फिर जिसे जो ठीक लगें वो अपने हिसाब से दोष मढ़ता रहे ।
यह सब देख, उनकी पवित्र आत्माएं । राधा-कृष्ण की आत्माओं से संवाद करती है कि यही फर्क है तुम्हारे और हमारे समय का ।
राधा-कृष्ण की आत्माएं अफसोस के साथ उत्तर देतीं हैं कि यही कारण है अब राधा-कृष्ण फिर जन्म नहीं लेते ।
हर रोज़ ज्यों ही शाम घिरने को आए वो फिर से वही जाकर बैठ जाए और साँसों से वातावरण को गर्म कर सूरज को डूबते हुए देखते रहें और फिर आरती-अज़ान को छोड़ पशु-पक्षियों व चरवाहों की आवाज़ सुनते हुए कहीं अंधेरे में खो जाए ।

छगन कुमावत "लाड़ला"©

Tuesday, 4 September 2018

है गुरुवर तुम्हें प्रणाम ...

पिताजी,  जिनसे ही इस जटिल
 मानव जीवन को सरलता व प्यार से
लबरेज़ होकर जीना सीखा ,,,
बहुत कुछ सीख रहा हूँ ।
 ।

      ¤ कविता ¤

है गुरुवर तुम्हें प्रणाम ।
है गुरुवर तुम्हें प्रणाम ।।

अर्जुन बनकर द्रोण को प्रणाम ।
राम बनकर वशिष्ठ को प्रणाम ।।

छाँट-छाँट अवगुण भगाएँ।
उबड़-खाबड़ जीवन पथ पर
अडिगता से चलना सिखाएँ ।।

है राष्ट्र निर्माता तुम्हें प्रणाम ।
है गुरुवर तुम्हें प्रणाम ।।

चंदा-सुरज की दुनिया से
वाकिफ़ कराया ।
न जाने कितनी मेरी
उलझनों को सुलझाना ।।

है पथ प्रदर्शक तुम्हें प्रणाम ।
है गुरुवर तुम्हें प्रणाम ।।

अपने ज्ञान चक्षु से
मेरा कौशल पहचाना ।
मुझमें है सूरज छूने का
हुनर आप से जाना ।।

है जीवन दिवाकर तुम्हें प्रणाम ।
है गुरुवर तुम्हें प्रणाम ।।

वैर, बेईमानी से
दूर बनाया ।
प्राणी मात्र के प्रति
प्रेम जगाया ।।

है देव तत्त्व तुम्हें प्रणाम ।
है गुरुवर तुम्हें प्रणाम ।।


छगन चहेता ©

Sunday, 2 September 2018

बस यूँ ही कभी-कभी...


डिब्बे में डिब्बा, डिब्बे में लस्सी ।
सबसे प्यारी तेरी हँसी ।।

ऐसी नादान शायरियाँ बनाता था तब , फिर भी न जाने क्यों ग़ालिब, फ़ैज को पढ़ने वाली । रोज़ कहती , लो सुनाओ ।
आज क्या बनाया ,,, नही कुछ नही
अरे सुनाओ,,, अब ज्यादा भाव मत खाओ
फिर सुनकर देर तक वाह! वाह! करती ।
मेरा उटपटांग शायरी बनाना, तुम्हें सुनाकर मुकम्मल कर जाना,,,, बस यही होता रहा कईं रोज़ तक ।
अबके छुट्टियाँ पड़ी तो ग़ालिब, फ़ैज, दुष्यंत को पढ़ा ।
कुमार विश्वास को सुना ताकि शेरों शायरी की विधा को समझ सकूँ ।
मतला, मुक्ता, क़ाफ़िया ,रदीफ़ को सीखा,,,
नया सत्र आरंभ हुआ लगा कि अब तुझे अच्छी-अच्छी शायरियाँ, ग़ज़लें सुनाऊंगा मगर पता चला कि तुमने शहर छोड़ दिया, लाज़िम भी था मुसाफ़िर जो थी ।
मेरा जज़्बातों को अल्फाज़ो में ढ़ालना बदस्तूर जारी रहा ।
वक़्त के पन्ने पलटते गये, शायरियाँ रफ कापियों के साथ रद्दी होती गई मगर मन में सुलगती रही ,,, उसके मुकम्मल होने को तेरे कानों तक पहुँचना जरूरी जो था ।
Instagram, FB , Twitter, blog पर शेयर किया । यही सोचकर कि तू इस भौतिक जहां में ना जाने कहीं मिले न मिले मगर इस आभासी दुनिया में तो मिल ही सकती है ।
सोशल मीडिया पर नया notification देखता हूँ तो लगता है कि हो सकता है ये तेरा होगा लेकिन वहाँ कोई और होता है । ना जाने कितनों के मोबाइल स्क्रीन से होकर वो दिलों तक जाती है मगर फिर भी अधूरी सी मुझे देखती है ।
Search box पर तेरा नाम डालाता ,,, हजारों परिणाम आए लेकिन मुझे तो किसी एक की खोज थी ।
कम्प्यूटर है इंसान नहीं न ,दिमाग़ हैं दिल नहीं न , फिर जज़्बात बेचारा कैसे समझता ।
वही नाम , सरनाम वाली दो-तीन प्रोफाइल देखकर,,, मन मारकर वापस से जज़्बातों को अल्फाज़ो में उतारने लग जाता हूँ ।
बस यूँ ही कभी कभी याद आता है,,,
बस यूँ ही कभी कभी ख्याल आता है,,,।


छगन चहेता ©

(तस्वीर,हेतु लिम्मा, लाखा राम के साथ  सुजेश्वर पहाड़ी के भ्रमण के समय की , कैमरे में लाखा राम ने सहेजी ।)

Thursday, 23 August 2018

बहना,,,,(कविता)

बहन "जमना" के लिए छोटे भाई की एक नन्हीं पेशकश,,
परवाह नहीं कि कभी तेरी,

नहीं पता था कि इस मासूम को कि तुम हो इस आँगन की चिडिया ,

जिसे उड़ा देंगे ये अपने ही सारे ।

रोज तुम्हें ससुराल के ताने दे देकर चिढ़ाते थे ।

पर क्या मालूम की यूँ चली जाओगी बैंड बाजों के साथ ।

जिस दिन तुम छोड़ चली हो पिया के घर , सुनी रह गई आपके बाबुल की चौखट ।

इंतजार रहता है तेरे आने का हर रक्षाबंधन पर,

पर जब तुम नहीं आती,
 
तो कितनी सुनी लगती है मेरी कलाई ।

जब तुम यहाँ थी तो राखी बांधना, तिलक लगाना सब दिखावा लगता था ,

अब चला पता कि ये सब कितना सुहाना होता था।

था नहीं पता कि कभी ये दिन भी आयेंगे ,

अपने बाबुल के घर कितने दिन रहना है ये पहले ही बता दिये जाएंगे ।

खैर, दुनिया के रस्मों को निभाना तो पड़ता है,

छोटे कि दुआ यही है बहना , खुश रहो संग अपने पिया ।

आये ना आफत कोई, घर तेरे बहना।

कह तो दिया पर सच कहूँ तेरी बहुत याद आती है, तेरी बहुत याद आती है ।

नहीं पता कि क्यों तुम्हें ही रस्मों की अदायगी में,

हमें छोड़ ससुराल जाना पड़ता है ।

बहन को अपने ही भाईयों से जुदा होना पड़ता है ।

गर होता पता कि एक दिन तुम ससुराल चली जाओगी तो नहीं सताते तुझे, कभी नहीं सताते तुझे,,

तुम चली गई हो घर पिया के ,,,,

बहना तेरी बहुत याद आती है,,,

हम सबको तेरी बहुत याद आती है ।।

छगन चहेता ©
[मेरी इस कविता  का "युव वाणी कार्यक्रम, मालाणी रेडियो स्टेशन " पर भी  वाचन हो चुका है।]

Tuesday, 14 August 2018

धर्म:मानव को मानव बनाए रखने की भावना है,,,,

भादरेश गाँव का शिव मन्दिर का दृश्य,,, click by थानेश कुमावत,,,7 अगस्त 2018
धर्म : बचपन से धार्मिकता से ही घिरा रहा । कहानियाँ, किस्से कुछ भी सुने , धर्म से जुड़े ही सुने लेकिन धर्म ने कभी यह नहीं सिखाया कि वो गैर है , वह तुमसे भिन्न है, वह तुम्हारी नफ़रत के लायक है ।
प्रेम, शांति भाईचारा ही सीखा,,, जिस धर्म को भी पढ़ा ।

मेरे परिवार, नाम, रहन-सहन से, तुम मुझे किसी एक धर्म से जोड़ते हो,,, उस धर्म को मानता भी होगा मगर ,,,खुद को धार्मिक भावनाओं में जकड़ने नहीं देता,,,,,धर्म मानव को मानव बनाए रखने की भावना है ।
इन (धर्म) चीजों को कुछ असामाजिक तत्वों की भेंट ना चढ़ने दे ,,,, ये विविधता हमारी पहचान है इसे प्यार के साथ स्वीकार करें,,,, भिन्नता को नफ़रत का कारण ना बनाए ।।।सर्व धर्म जयते ।।।

Sunday, 5 August 2018

एल्बम : दिल के दीवार की

Picture background- राजस्थान के खजुराहो,,,किराड़ू मंदिर , बाड़मेर
Click by LAKHA RAM
नया सत्र शुरू हो चुका था । कक्षा में नये चेहरे आ रहे थे कई पुराने चेहरे गायब हो रहे थे । ऐसे ही माहौल में, वो लड़का ज्यों ही कक्षा में प्रवेशित हुआ, एक नये चेहरे से टकरा गया। जुबान से sorry व लबों से अनबनी मुस्कान के साथ अपनी-अपनी दिशा की ओर चलते बने ।
वो बैठने के बाद तब तक उस नये चेहरे को टकटकी लगाए देखता रहा जब तक कि मास्साब(अध्यापक) के चाॅक का टुकड़ा उसके 0.75 D वाले चश्मे से ना टकराया ।
"बेटा श्यामपट्ट इधर है ।"
ना, ना जी इश्क़-विश्क जैसा कुछ नहीं । पहली नज़र वाले प्यार की थ्योरी उसे वैसे भी समझ ना आती, ना ही वो चेहरे से मोहब्बत करने वालों में से हैं ।
उसे तो ऐसे ही नये चेहरों को गौर से देखने की अज़ीब सी आदत है लेकिन आज उसकी नजरें उस चेहरे पर कुछ ज्यादा ही स्थिर हो गई ।
उसकी नजरों को उस चेहरे की तलब बढ़ती गई ।
लंच के लिए ब्रेक हो चुका था मगर वो वहीं बैठा रहा ,,,मोहतरमा जो वहाँ थी ।
शायद आँखों की प्यास ने पेट की आग को बुझा दिया था।
एक दोस्त ने उससे मिलवा भी दिया ।
उसने हाथ आगे बढ़ाते हुए कहा "आई एम जिज्ञासा "
नाइस नेम ,
उसने , अपना भी परिचय दिया ।
काफी कुछ दोस्त ने; लड़के को नये चेहरे के बारे में, नये चेहरे को उस लड़के के बारे में बताया लेकिन,, वो बस उसे देखता रहा ।
बाय ! कह कर, दोनों चल दिये ।

वह काफी देर वहाँ खड़ा रहा ,,,,, वह चाहता था कि किसी दिन उसे गिटार बजाकर सुनाए और देर तक सुनाए,,, चाहे तो अकेले नहीं तो सरेआम सुनाए,,,।
उसे फर्क नहीं पड़ता कि गिटार के रोमांटिक गाने की धुन पर वो किसी और के ख्वाब बुने , उसे फर्क नहीं पड़ता कि वो गिटार सुनते सुनते किसी और के कंधे पर सो जाए।
वो तो बस यूँ ही ना बुझने वाली प्यास के साथ उसे निहारना चाहता था ताकि उस चेहरे के बहुत से चित्रों की एल्बम बनाकर अपने दिल की दीवार पर लटका सके ।
छगन चहेता ©
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Saturday, 28 July 2018

अतीत का दोहराव ?


आसमां में बादल थे , उमस कुछ ज्यादा ही थी । बदन पर चिचिपाहट महसूस हो रही थी लेकिन वो इन सबसे दूर कही और था ।
छोटी-छोटी जो बूंदे गिर रही थी वो तो महसूस कर रहा था लेकिन उसके सिवाय वर्तमान की तमाम चीजों को नजरअंदाज किये किसी अतीत की धुंधली तस्वीर लिए,, मंद मंद मुस्कुरा रहा था शायद कोई हसीन लम्हे को याद कर रहा था ।
तभी तेज होती बारिश ने उसे जगाया । चाहा कि भीगता ही रहूँ लेकिन,,,,,?
अतीत को दोहराने की कोशिश करों तो अतीत अपनी पहचान खो देता है ,,, उसमें नयापन आ जाएगा,,, फिर उसकी याद इतनी मोहक नहीं होगी ।
वो छत पर ही बने कमरे की ओट में आकर बारिश देखने लगा ,,, गिरती बूंदो से पनिहारी बन रही थी जो मानों बुला बुला के कह रही हो कि आओ,,, मेरे साथ तुम भी झूमों,,, मैं भी अतीत को दोहरा रही हूँ फिर तुम क्यों डरते हो ।
इतने में एक हवा का झोंका आया जिसने उसे पूरी तरह से भीगो दिया,,, अब अतीत की धुंधली तस्वीर साफ हो गई थी ,,,
वो किसी अतीत को याद कर नहीं वर्तमान के हसीन लम्हे को जी रहा था ,,,,,
अतीत की उस हसीन तस्वीर के साथ एक और तस्वीर रख ,,कोई गाना गुनगुनाते हुए नीचे चला गया ।
छगन चहेता ©

डायरी : 2 October 2020

कुछ समय से मुलाकातें टलती रही या टाल दी गई लेकिन कल फोन आया तो यूँ ही मैं निकल गया मिलने। किसी चीज़ को जीने में मजा तब आता है जब उसको पाने ...