Sunday, 2 September 2018

बस यूँ ही कभी-कभी...


डिब्बे में डिब्बा, डिब्बे में लस्सी ।
सबसे प्यारी तेरी हँसी ।।

ऐसी नादान शायरियाँ बनाता था तब , फिर भी न जाने क्यों ग़ालिब, फ़ैज को पढ़ने वाली । रोज़ कहती , लो सुनाओ ।
आज क्या बनाया ,,, नही कुछ नही
अरे सुनाओ,,, अब ज्यादा भाव मत खाओ
फिर सुनकर देर तक वाह! वाह! करती ।
मेरा उटपटांग शायरी बनाना, तुम्हें सुनाकर मुकम्मल कर जाना,,,, बस यही होता रहा कईं रोज़ तक ।
अबके छुट्टियाँ पड़ी तो ग़ालिब, फ़ैज, दुष्यंत को पढ़ा ।
कुमार विश्वास को सुना ताकि शेरों शायरी की विधा को समझ सकूँ ।
मतला, मुक्ता, क़ाफ़िया ,रदीफ़ को सीखा,,,
नया सत्र आरंभ हुआ लगा कि अब तुझे अच्छी-अच्छी शायरियाँ, ग़ज़लें सुनाऊंगा मगर पता चला कि तुमने शहर छोड़ दिया, लाज़िम भी था मुसाफ़िर जो थी ।
मेरा जज़्बातों को अल्फाज़ो में ढ़ालना बदस्तूर जारी रहा ।
वक़्त के पन्ने पलटते गये, शायरियाँ रफ कापियों के साथ रद्दी होती गई मगर मन में सुलगती रही ,,, उसके मुकम्मल होने को तेरे कानों तक पहुँचना जरूरी जो था ।
Instagram, FB , Twitter, blog पर शेयर किया । यही सोचकर कि तू इस भौतिक जहां में ना जाने कहीं मिले न मिले मगर इस आभासी दुनिया में तो मिल ही सकती है ।
सोशल मीडिया पर नया notification देखता हूँ तो लगता है कि हो सकता है ये तेरा होगा लेकिन वहाँ कोई और होता है । ना जाने कितनों के मोबाइल स्क्रीन से होकर वो दिलों तक जाती है मगर फिर भी अधूरी सी मुझे देखती है ।
Search box पर तेरा नाम डालाता ,,, हजारों परिणाम आए लेकिन मुझे तो किसी एक की खोज थी ।
कम्प्यूटर है इंसान नहीं न ,दिमाग़ हैं दिल नहीं न , फिर जज़्बात बेचारा कैसे समझता ।
वही नाम , सरनाम वाली दो-तीन प्रोफाइल देखकर,,, मन मारकर वापस से जज़्बातों को अल्फाज़ो में उतारने लग जाता हूँ ।
बस यूँ ही कभी कभी याद आता है,,,
बस यूँ ही कभी कभी ख्याल आता है,,,।


छगन चहेता ©

(तस्वीर,हेतु लिम्मा, लाखा राम के साथ  सुजेश्वर पहाड़ी के भ्रमण के समय की , कैमरे में लाखा राम ने सहेजी ।)

Thursday, 23 August 2018

बहना,,,,(कविता)

बहन "जमना" के लिए छोटे भाई की एक नन्हीं पेशकश,,
परवाह नहीं कि कभी तेरी,

नहीं पता था कि इस मासूम को कि तुम हो इस आँगन की चिडिया ,

जिसे उड़ा देंगे ये अपने ही सारे ।

रोज तुम्हें ससुराल के ताने दे देकर चिढ़ाते थे ।

पर क्या मालूम की यूँ चली जाओगी बैंड बाजों के साथ ।

जिस दिन तुम छोड़ चली हो पिया के घर , सुनी रह गई आपके बाबुल की चौखट ।

इंतजार रहता है तेरे आने का हर रक्षाबंधन पर,

पर जब तुम नहीं आती,
 
तो कितनी सुनी लगती है मेरी कलाई ।

जब तुम यहाँ थी तो राखी बांधना, तिलक लगाना सब दिखावा लगता था ,

अब चला पता कि ये सब कितना सुहाना होता था।

था नहीं पता कि कभी ये दिन भी आयेंगे ,

अपने बाबुल के घर कितने दिन रहना है ये पहले ही बता दिये जाएंगे ।

खैर, दुनिया के रस्मों को निभाना तो पड़ता है,

छोटे कि दुआ यही है बहना , खुश रहो संग अपने पिया ।

आये ना आफत कोई, घर तेरे बहना।

कह तो दिया पर सच कहूँ तेरी बहुत याद आती है, तेरी बहुत याद आती है ।

नहीं पता कि क्यों तुम्हें ही रस्मों की अदायगी में,

हमें छोड़ ससुराल जाना पड़ता है ।

बहन को अपने ही भाईयों से जुदा होना पड़ता है ।

गर होता पता कि एक दिन तुम ससुराल चली जाओगी तो नहीं सताते तुझे, कभी नहीं सताते तुझे,,

तुम चली गई हो घर पिया के ,,,,

बहना तेरी बहुत याद आती है,,,

हम सबको तेरी बहुत याद आती है ।।

छगन चहेता ©
[मेरी इस कविता  का "युव वाणी कार्यक्रम, मालाणी रेडियो स्टेशन " पर भी  वाचन हो चुका है।]

Tuesday, 14 August 2018

धर्म:मानव को मानव बनाए रखने की भावना है,,,,

भादरेश गाँव का शिव मन्दिर का दृश्य,,, click by थानेश कुमावत,,,7 अगस्त 2018
धर्म : बचपन से धार्मिकता से ही घिरा रहा । कहानियाँ, किस्से कुछ भी सुने , धर्म से जुड़े ही सुने लेकिन धर्म ने कभी यह नहीं सिखाया कि वो गैर है , वह तुमसे भिन्न है, वह तुम्हारी नफ़रत के लायक है ।
प्रेम, शांति भाईचारा ही सीखा,,, जिस धर्म को भी पढ़ा ।

मेरे परिवार, नाम, रहन-सहन से, तुम मुझे किसी एक धर्म से जोड़ते हो,,, उस धर्म को मानता भी होगा मगर ,,,खुद को धार्मिक भावनाओं में जकड़ने नहीं देता,,,,,धर्म मानव को मानव बनाए रखने की भावना है ।
इन (धर्म) चीजों को कुछ असामाजिक तत्वों की भेंट ना चढ़ने दे ,,,, ये विविधता हमारी पहचान है इसे प्यार के साथ स्वीकार करें,,,, भिन्नता को नफ़रत का कारण ना बनाए ।।।सर्व धर्म जयते ।।।

Sunday, 5 August 2018

एल्बम : दिल के दीवार की

Picture background- राजस्थान के खजुराहो,,,किराड़ू मंदिर , बाड़मेर
Click by LAKHA RAM
नया सत्र शुरू हो चुका था । कक्षा में नये चेहरे आ रहे थे कई पुराने चेहरे गायब हो रहे थे । ऐसे ही माहौल में, वो लड़का ज्यों ही कक्षा में प्रवेशित हुआ, एक नये चेहरे से टकरा गया। जुबान से sorry व लबों से अनबनी मुस्कान के साथ अपनी-अपनी दिशा की ओर चलते बने ।
वो बैठने के बाद तब तक उस नये चेहरे को टकटकी लगाए देखता रहा जब तक कि मास्साब(अध्यापक) के चाॅक का टुकड़ा उसके 0.75 D वाले चश्मे से ना टकराया ।
"बेटा श्यामपट्ट इधर है ।"
ना, ना जी इश्क़-विश्क जैसा कुछ नहीं । पहली नज़र वाले प्यार की थ्योरी उसे वैसे भी समझ ना आती, ना ही वो चेहरे से मोहब्बत करने वालों में से हैं ।
उसे तो ऐसे ही नये चेहरों को गौर से देखने की अज़ीब सी आदत है लेकिन आज उसकी नजरें उस चेहरे पर कुछ ज्यादा ही स्थिर हो गई ।
उसकी नजरों को उस चेहरे की तलब बढ़ती गई ।
लंच के लिए ब्रेक हो चुका था मगर वो वहीं बैठा रहा ,,,मोहतरमा जो वहाँ थी ।
शायद आँखों की प्यास ने पेट की आग को बुझा दिया था।
एक दोस्त ने उससे मिलवा भी दिया ।
उसने हाथ आगे बढ़ाते हुए कहा "आई एम जिज्ञासा "
नाइस नेम ,
उसने , अपना भी परिचय दिया ।
काफी कुछ दोस्त ने; लड़के को नये चेहरे के बारे में, नये चेहरे को उस लड़के के बारे में बताया लेकिन,, वो बस उसे देखता रहा ।
बाय ! कह कर, दोनों चल दिये ।

वह काफी देर वहाँ खड़ा रहा ,,,,, वह चाहता था कि किसी दिन उसे गिटार बजाकर सुनाए और देर तक सुनाए,,, चाहे तो अकेले नहीं तो सरेआम सुनाए,,,।
उसे फर्क नहीं पड़ता कि गिटार के रोमांटिक गाने की धुन पर वो किसी और के ख्वाब बुने , उसे फर्क नहीं पड़ता कि वो गिटार सुनते सुनते किसी और के कंधे पर सो जाए।
वो तो बस यूँ ही ना बुझने वाली प्यास के साथ उसे निहारना चाहता था ताकि उस चेहरे के बहुत से चित्रों की एल्बम बनाकर अपने दिल की दीवार पर लटका सके ।
छगन चहेता ©
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Saturday, 28 July 2018

अतीत का दोहराव ?


आसमां में बादल थे , उमस कुछ ज्यादा ही थी । बदन पर चिचिपाहट महसूस हो रही थी लेकिन वो इन सबसे दूर कही और था ।
छोटी-छोटी जो बूंदे गिर रही थी वो तो महसूस कर रहा था लेकिन उसके सिवाय वर्तमान की तमाम चीजों को नजरअंदाज किये किसी अतीत की धुंधली तस्वीर लिए,, मंद मंद मुस्कुरा रहा था शायद कोई हसीन लम्हे को याद कर रहा था ।
तभी तेज होती बारिश ने उसे जगाया । चाहा कि भीगता ही रहूँ लेकिन,,,,,?
अतीत को दोहराने की कोशिश करों तो अतीत अपनी पहचान खो देता है ,,, उसमें नयापन आ जाएगा,,, फिर उसकी याद इतनी मोहक नहीं होगी ।
वो छत पर ही बने कमरे की ओट में आकर बारिश देखने लगा ,,, गिरती बूंदो से पनिहारी बन रही थी जो मानों बुला बुला के कह रही हो कि आओ,,, मेरे साथ तुम भी झूमों,,, मैं भी अतीत को दोहरा रही हूँ फिर तुम क्यों डरते हो ।
इतने में एक हवा का झोंका आया जिसने उसे पूरी तरह से भीगो दिया,,, अब अतीत की धुंधली तस्वीर साफ हो गई थी ,,,
वो किसी अतीत को याद कर नहीं वर्तमान के हसीन लम्हे को जी रहा था ,,,,,
अतीत की उस हसीन तस्वीर के साथ एक और तस्वीर रख ,,कोई गाना गुनगुनाते हुए नीचे चला गया ।
छगन चहेता ©

Sunday, 15 July 2018

आँसूओं का प्यार,,,,

कभी तन्हा होता हूँ तो इन्हीं रेतीले टीलों पर आकर बैठ जाता हूँ । ये तुम से है, चंचल । अंधड़ के साथ खुद को यूँ बदल देते है कि लगता ही नहीं ,, कि अभी अभी कोई यहाँ से गुजरा था। खुद में उलझा के , खुद बेखबर रहते है ।
जब भी यहाँ आता हूँ । मन मैं एक प्रश्न उठता है " तुम लौट आओगी?"
तुम मुझे मिस करती हो कि नहीं ना यह पूछने का हक है ना जरूरत ।
नहीं, मैं तुम्हें मिस नहीं करता ।ना उन कंधों को ,ना उन हाथों को जो सहारा दिया करता था ,, अन्दरूनी दलदल से मुझे खींच लाया करता था क्योंकि मुझे अब उस दलदल से प्यार हो गया है जो मुझे खुद में समा लेना चाहता है ।
हाँ, ये मेरे आँसू तुझे बहुत मिस करते हैं । तुम थी तो ये अनायास ही निकल आते थे चाहे खुशी हो या गम ,,, इन्हें अच्छा लगता होगा जब तुम आँसुओं को मेरे गालों से अपने कोमल अँगुलियों में लेती थी फिर उसी अँगुलियों से अपने आँसुओं को पोंछती थी । उन्हें उस पल से मोह था ।
शायद, मेरे आँसुओं को तेरे आँसूओं से प्यार हो गया था । ऐसा प्यार,,, जो बहुत ही गहरा था जिसे ना तुमने समझा ना मैंने ।
अब , जब तुम नहीं हो तो आँसू भी आँखों से नदारद है,, कभी-कभी आते भी हैं तो गालों पर ही सूख कर खुद को मिटा देते हैं और छोड़ जाते हैं लवण के रूप में अपनी निशानी,,, जिसे देखकर तुम कभी लौट भी आओ, यहीं आशा लिए ।
अकेले में चुपके से , अपना दिल बहलाने के लिए पूछते हैं कि "तुम लौट आओगी?"
मैं निरूत्तर होकर दलदल में उतरता ही रहता हूँ और आँसू मेरी बेबसी के गम में पलकों से उतर गालों पर से ढ़लने लगते हैं, ,, मेरे गमों का भार लिए,,,गालों पर ही तड़प तड़प कर सूख जाते है,,, गमों की रेखा छोड़ जाते हैं ।
उसी में प्रश्न छिपा रहता है,,, तुम लौट आओगी ?
सचमुच में कभी लौट आओगी ?
लौट आओगी ?

          -  छगन चहेता ©

Saturday, 30 June 2018

मोहब्बत (कविता)


एक रोज मुझे मोहब्बत मिली थी ,

वो एक कोने में चुपचाप खड़ी थी ।

बोला गुमसुम सी क्यों हो ?

बताओं तुम कौन हो?

मोहब्बत हूँ , जनाब ।

उसे गौर से देखा ,

विश्वास न हुआ ।

बोला क्यों फिरकी लेती हो ?

तुम मोहब्बत हो ही नहीं सकती।

तुम सादी-सिम्पल ,

ना जिस्मानी नूर ।

फिर कैसे मोहब्बत हो सकती हो ।

हो सकता है तुम्हें मैं बच्चा दिखता हूँ

मगर कच्चा न समझो ।

फिल्में भी देखी है ,

कहानियाँ भी सुन रखी हैं ।

मोहब्बत होती है

गुलाबी गाल , गोरी कलाईया

कजरारे नैन, सुनहरे बाल

बताओं तुममे इसमें से

एक भी है बात ।

बोली तुम भी नासमझ निकले ।

एक दिन ये रंग उड़ जाएगा ,

तब क्या मोहब्बत मर जाएगी ।

रंग, चाल - ढाल ना जाने

तुम कहाँ से लायें ?

आँखों में इज्ज़त ,

दिल में प्रेम हो जिसके

उसी की हो जाती हूँ ।

सच कहती हूँ ,

मोहब्बत हूँ ।

ब्यूटी पार्लर में नहीं ,

दिल में सजती हूँ ।।

          - छगन चहेता

चित्र-
[https://www.deviantart.com/nhienan/art/lonely-526665523]

Monday, 25 June 2018

प्रकृति-एक प्रेमिका

वो अपनी जुल्फे संवारें बैठी थी । मुझ पर अपनी मोहब्बत बरसाना चाहती थी । अपनी ओर आकर्षित करने के लिए हर संभव प्रयास किये जा रखी थी। दूसरी तरफ मैं था जो बस कामुकता की ओर बढ़े जा रहा था ।उसकी मनोहरमता को नजरअंदाज कर भौतिकता की ओर बढ़ रहा था ।
मेरे दिल में भी उसके लिए प्रेम था मगर फिर भी ना जाने क्यों? उससे मुख मोड़ रहा था और मुझे सिर्फ मादकता खिंच रही थी वो मादकता जो मेरी सच्ची महबूबा की सजावट को नष्ट कर रही थी।
मैं मादकता, कामुकता के तले चुप था , महबूबा मेरे लिए अभी भी अपना प्यार लिए बैठी थी फिर भी मेरी मादकता की आग उसकी सजावट जलाए जा रही थी। वो मोहब्बत की आस में अपनी मोहब्बत लुटाए जा रही थी, मैं लालच से लबरेज़ हो उसे लुटता ही जा रहा था । भौतिकता के सुख भोगने के ख़ातिर ।
अब पूरी तरह से भौतिकता पर आ गया था , उसे पाने की आस में अपनी महबूबा पर घात करना तक शुरू कर दिया । बोल दिया कि भौतिकता के होते तेरी जरूरत क्या?
लेकिन कुछ वक़्त बाद उसे भोगते- भोगते मुझे अहसास होने लगा कि सिर्फ बाहरी खुशी मिल रही है अन्दर ही अन्दर उदासी छा रही है । भौतिकता मेरा दुरूपयोग करने लगी है, बेवफाई करने लगी है । हमारे संबंध हथकड़ी बनने लगे हैं । उसका विस्तृत संसार जेल सा लग रहा है । मानो सांसें उखड़ने लगी हैं । प्रेम की प्यास के मारे हलक़ सूखा जा रहा था और भौतिकता मेरी अपने से प्यार करने की बेवकूफी पर हँस रही थी,,,अपने सीधे - उल्टे तर्क दिये जा रही थी । जो भी हो रहा था मुझे ही अपराधी ठहराया जा रहा था ।
फिर जब हताश, निराश सांसें थमने लगी तब अपनी पहले की महबूबा की ओर आस लगाई,,, लगा कि वो मेरी हालत पर ठहाका लगाएगी, लेकिन नहीं वो आज भी अपनी मोहब्बत लिए खड़ी थी।
हाँ, वो मेरी मादकता के तले उजड़ चुकी थी , भौतिकता के उत्पात के कारण । फिर भी मेरा रूख़ अपनी ओर देख वो खिल उठी थी , स्वागत को थाल लिए खड़ी थी, झुलसी सजावट संवारने लगी थी , उसकी जवानी लौटने लगी थी ।
वो मेरी बेवफाई के ताने देने के बजाय मेरे लौट आने की खुशी में झूमने लगी थी ।
वो मेरी महबूबा " प्रकृति " ही है जो बस मेरा प्रेम चाहती है और कुछ नही । बदले में खुशी, शांति और सौन्दर्य का दीदार कराना चाहती है ,,,, अब बस प्रकृति के साथ खुश हूँ । इससे मुझे असीम प्यार मिलता है जो कभी खत्म नहीं होगा,,,,,,,,,,

वैसे भौतिकता से नफ़रत नहीं पाले रखी है,, उसे भी दोस्त बना रखी है ।
                                   ।।प्रकृति।।

                                                 - छगन चहेता
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Monday, 18 June 2018

नींव को अभी पकना है,,,,

वो अचानक झिझक कर उठा । लगा कोई स्वप्न देखा होगा, किशोर अवस्था में है, वैसा ही कुछ देखा होगा । ठीक से याद तो नही लेकिन चंचल मन की ख्वाहिश का कोई महल धड़ाम से गिरा हो ऐसा लगा ।
सोचा मुँह धो लें, बाल सँवार लें मगर अचानक जागने की वजह से बैचैनी हो रही थी । फ्रिज से पानी की बाॅटल निकाली और घर के सामने बनी मकान की नींव पर बैठ गया । वह नींव भी महल खड़ा करना चाहती थी लेकिन उसे अभी पकने के लिए छोड़ा गया था । महल का सुख लम्बे समय तक भोगने के लिए । उसे क़ाबिल होना होगा भार सहने के लिए ।
सूरज ढलने लगा था। हवा अपनी गति मंद कर , बदन को हौले से सहलाने लगी थी ।
वह सपने की बात भूल कहीं और ही जाने लगा था । किशोर मन युवा होने लगा था । महल बनाना चाहता तो था मगर पकाने के लिए रखी नींव देख उसकी तंरगे संयमित होने लगी थी ।
उसे लगने लगा कि कहने से पहले सुन लेना चाहिए ।
सपने हल्के नहीं होते , रिश्ते बेभार नहीं होते । उसे देर तक टिके रहने के लिए नींव का मज़बूत होना जरूरी है ।

"नींव के बहने से ज्यादा महल के ढ़हने से गम होता है ।"

आसमान में बादलों को देख आस लगाई । बरस जाये तो सुखे रेगिस्तान की प्यास भी बुझे और नींव भी पके ।
अब तक वो बाॅटल का सारा पानी पी चुका था जिसने उठ रही किशोर आकांक्षाओं को शीतलता प्रदान की । पानी ने आग को बुझाया नहीं बल्कि वो काम किया जो उफनते दूध पर पानी के छींटे करते हैं । दूध को स्वादिष्ट खीर बनने तक उफान को रोक , पकना ही होगा,,,, अब तक वो घर के अंदर जा चूका था । बाहर निकला जो किशोर, अब युवा समझ लिए जा रहा था ।

               
                             
                                              - छगन चहेता


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Saturday, 16 June 2018

लौट आओ .....

विज्ञान कहती है कि आँधी वायु दाब की असमानता के कारण आती है तो मैं ठहरा विज्ञान का विद्यार्थी, तेरे अहसास को भी प्रकृति से जोड़ने लगा , उस के जैसा मानने लगा ।
जैसे तीन रोज पहले आँधी शुरू हुई थी थार नगरी में । उसी तरह किसी रोज तुम भी आई थी मेरे अहसास, दिल , दिमाग, विचार में ।
जिस तरह आँधी वातावरण को रेतमय कर देती है वैसे ही मेरे विचार- अहसास तुममय हो गये थे ।
सोचा यह अजीब सा अहसास भी प्रकृति जैसा होगा । आँधी के बाद बादल आयेंगे, बरसात आयेंगी..... सूखी धरा पर बूँदों के पड़ते ही सौंधी खुशबु फुट पड़ेगी जो मेरे जीवन को मद्यमय कर देगी फिर जो हरियाली ऊपजेगी वो सतत्, अटल होगी जिसका अहसास कभी ज़ेहन से उतर ना पाएगा ।
लेकिन मेरा एक ही पहलू पर ध्यान देना गलत निकला .... भूल गया कि आँधी कुछ ज्यादा हो वो तूफ़ान कहलाता है । बरसात तो होगी मगर वो खुशबु से पहले ही धरती का उपजाऊपन बहा ले जाती है और पीछे रहता है बंजर , निर्जन मैदान जिससे ना महक आती है ना ही हरियाली । फिर से उसे उपजाऊ होने में कई साल, जीवन लग जाते हैं ।
दोष तुम्हारा नहीं, तुम भी हवा की तरह निर्दोष हो । हवा कहाँ आँधी बनना चाहती है, दाब उसे मजबूर करता है, गर्मी उसे उकसाती है वैसे तुम्हें, तुम्हारे अहसास को भी किसी ने दबाया था ,, तुम भी मजबूर थे।
हर आँधी तूफ़ान ना बनती , हर बारिश में बाढ़ ना आती ,,, लौट आओ,,,फिर लौट आओ,,,, नये तेज के साथ
किसी रोज फिर लौट आओ आँधी की तरह बरसात लेकर । भींगो दो इस सूखे रेगिस्तान को ...
उससे पहले कि कोई यूरिया डाल, ,, ज़मीन को हरा कर दे,,,, निर्जन देख अपना हक जमा दे,,,,तुम लौट आओ ।
लौट आओ, प्राकृतिक खाद डाल हरा कर दो ,,,,
आँधी, वर्षा, भीनी खुशबू, हरियाली भर दो,,,,तुम लौट आओ,,,
राजस्थान की आँधी बनके ,,, समुद्र की लहर बनके,,,, नदी की तरंग बनके ,,, किसी जाड़े के रोज की ठण्डी हवा का झोंका बनके,,, तुम लौट आओ ,,,,
किसी रोज तुम लौट आओ खुद के उजाड़े चमन में,,,,,,

                                     - छगन चहेता 

Thursday, 14 June 2018

वेश्यावृत्ति ????

सभ्य होने के दिखावे सेबेहतर रहेगा कि सभ्य होने का प्रयास करें ।

वेश्या, धंधेवाली... ऐसे नाम सुनकर अक्सर हम गंभीर होने के बजाय मुस्कुराते हैं ना ।
क्यों ? यह बताना आवश्यक नहीं है ।
केवल पुरूषों की बात नहीं हैं महिलाएं भी । क्योंकि वो सभ्य समाज के लिए आनंद का ही तो साधन है ना ।
वेश्यावृत्ति में ये क्यों आती हैं ? कौन लाता है? ये प्राथमिक सवाल नहीं हैं ।
प्राथमिक सवाल यह है कि ये वेश्यावृत्ति है, क्यों?
इसकी वजह क्या है कि ये चाहकर भी इससे बाहर नहीं निकलना चाहती ?
ये विषय इतना हास्यास्पद क्यों है?
हमारे लिए जो चीज़ अनमोल है, जिसे गैर के छुने तक से , हम सबकुछ खोने के समान समझते हैं "इज्ज़त"
उसे वो चंद नोटों के बदले, चाहे उसे देने को राजी कैसे हो जाती है बल्कि इसके लिए तत्पर रहती है ।
ऐसा क्यों ? नहीं पता ना ,, क्योंकि कभी ऐसी बातों पर हँसने-मुस्कराने के अलावा गंभीरता से सोचा भी नहीं ।
वेश्यावृत्ति आज से नहीं बल्कि प्राचीन युगों से ही इसके होने की पुष्टि होती हैं ।
सुनने को मिलता है कि पुरुष अपने तनाव को दूर करने के लिए इन तक जाते हैं लेकिन मुझे पुरुषत्व की चरम तक पहुँचने के बाद तक ऐसा नहीं लगता कि ये तनाव निवारक हो सकता है । यह सिर्फ अविकसित मानसिकता का अनैतिक विचार है ।
इनके वेश्यावृत्ति में लिप्त होने का कारण चाहे कुछ भी हो । घरवालों द्वारा बेचा गया, अपहरण किया गया या ये खुद अपनी किसी मजबूरी / धोखे से आई हो लेकिन इसके बाद ये स्वेच्छा से इसी कार्य में लिप्त रहतीं हैं । कोशिश की जाए तो भी छोङना नहीं चाहतीं । क्यों ?
मैं ऐसी ही किसी महिला का इंटरव्यू देख रहा था उसमें वो किसी प्रश्न के जवाब में कहती है "हमें नंगा होने से नहीं, इज्ज़त से डर लगता है ।"
उनकी ऐसी मानसिकता की वजह क्या है ?
हम सब , हमारी सोच ।
हम यही सोचते हैं न कि
इनको धन (रू) चाहिए । जिस्म के बदले धन और कुछ नहीं ।
प्यार, मोहब्बत और इज्ज़त जैसी भावनाओं से, ये कोसों दूर है । इनका यही काम है और यही धंधा है ।
हमारी इस सोच से , ये वाकिफ़ हैं इसी कारण वेश्यावृत्ति को छोङना नहीं चाहतीं ।
उन्हें मालूम है कि जब मैं इससे बाहर निकलुंगी तो कोई अपनाने को तैयार नहीं होगा । सार्वजनिक तौर पर सब मुझसे दूर, घृणित होने का दिखावा करेंगे ।
मैं किसी से मोहब्बत कर भी लूं तो सामने वाले की मोहब्बत मेरे जिस्म तक ही रहेगी ।
सरेआम कौन मेरी मोहब्बत को मानेगा ।
इन सबसे बेहतर मानती है कि इन तथाकथित सभ्य लोगों की समाज में खुद को लाकर जलील करने के बजाय खुद से लोगों के बीच ही रहूँ तो अच्छा है । लोगों की नज़र चुभेगी तो नहीं । पता तो रहेगा कि ये आया ही जिस्म से खेलने, कोई दिल से तो ना खेलेगा ।

"कोई महिला चाहकर भी वेश्यावृत्ति से नहीं निकलना चाहती है तो उसकी दोषी हैं, तुम्हारी वो अश्लील हँसी , वो तिरछी नजरें । जो वाकई में तो उसकी जिस्म पर हैं लेकिन सरेआम घृणा से भरी है ।"

आशा करता हूँ कि कोई अगर ऐसे मंज़र से निकल आयी हैं तो उसे सम्मान , सहयोग देंगे । वो सब - कुछ भुलाना चाहती है तो अपनी हरकतों, व्यवहार से उन्हें याद दिलाने की कोशिश नहीं करेंगे । आपकी नजरें उसके नारिय जिस्म के बजाय इंसानी स्वरूप पर पड़ेगी ।

चलता हूँ ,,, आप पर आशाओं  का बोझ डालकर ।।  
चलता हूँ,,,खुद की आशाओं का बोझ हल्का करने ।।
                              ।। नारीत्व ।।
                                                  - छगन चहेता
[फोटो https://goo.gl/images/C8wdQ4 से ]

डायरी : 2 October 2020

कुछ समय से मुलाकातें टलती रही या टाल दी गई लेकिन कल फोन आया तो यूँ ही मैं निकल गया मिलने। किसी चीज़ को जीने में मजा तब आता है जब उसको पाने ...